As Delhi gets ready for Election, a Delhiite through his Hindi poem tells you why Delhi needs ‘AAP’ and ‘Arvind Kejriwal’

Aam Admi Party kejriwal ‘आप‘ का हमनाम होना चाहता हूं

विकास का हमनाम होना चाहता हूं,
सच के लिये बदनाम होना चाहता हूं।
तपती धरती से जो खुद-ब-खुद उठा हो,
बादल भरा एैसा ही इक, आसमान होना चाहता हूं ।
विकास का हमनाम होना चाहता हूं।

प्रेम न्याय भाईचारे से भरा हो,
सच्चे हर दिल का, यही अरमान होना चाहता हूं।
बिन कहे ही समझ जाये शत्रु जिसको,
नापा-तौला, अनकहा, फरमान होना चाहता हूं।
विकास का हमनाम होना चाहता हूं।

गरीब के चूल्हे से जो रोजा़ना उट्ठे,
उस धुएं के साथ मैं, गुमनाम होना चाहता हूं।
मेहनतकशों की बेटियों को जो संवारे,
उस ही डोली का तो मैं, सामान होना चाहता हूं।
विकास का हमनाम होना चाहता हूं।

पगडंडियों को सड़क में तब्दील कर दे,
उस सुशासन की ही मैं, कमान होना चाहता हूं।
गांव गांव जिसके सुर में सुर मिलाये,
उन्नती का पक्षधर, वो गान होना चाहता हूं।
विकास का हमनाम होना चाहता हूं।

आखिरी इंसाफ जिस दर पर है मिलता,
वो आरती, वो प्रार्थना, वो सुरमयी आज़ान होना चाहता हूं।
धन और सत्ता के खुदाओं की धरा पर
इंसान हूं , इंसान होना चाहता हूं।
विकास का हमनाम होना चाहता हूं।

दीन-मज़हब, जाति-पाति, काला-गोरा,
सबको दफनाने को मैं, शमशान होना चाहता हूं।
वर्ग खंडित इस धरा को जो कहे की,
देखो उस ‘बच्चे‘ की वो मुस्कान, होना चाहता हूं।
विकास का हमनाम होना चाहता हूं।

दिल्ली दिलवालों की रही है हाॅ ये सच है,
राजनीति खा गयी वो भाईचारा।
गरीब होना कोई नाकामी नहीं है,
सी एम नहीं, केजरीवाल होना चाहता हूं।
‘आप‘ का हमनाम होना चाहता हूं।

विकास ठाकुर