हाल ही में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के राजनैतिक कृयाकलापों ने कई लोगों को ये सोचने पर मजबूर किया कि आम आदमी पार्टी सत्ताधारी पार्टी है या विपक्षी पार्टी

हाल ही में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के राजनैतिक कृयाकलापों ने कई लोगों को ये सोचने पर मजबूर किया कि आम आदमी पार्टी सत्ताधारी पार्टी है या विपक्षी पार्टी। दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार को समर्थन दे के भी कांग्रेस पार्टी की ‘केंद्रीय’ सरकार ‘दिल्ली विधान सभा’ में सक्षक्त विपक्ष की भूमिका में दिखी, वहीं भाजपा जो असल में दिल्ली में विपक्षी पार्टी है वो अपने एक भूतपूर्व नेता की तरह ये कहते हुए प्रतीत हुई कि ‘कभी वो हमारे काम आते हैं तो कभी हम उनके’। दिल्ली और केंद्र दोनों में विपक्षी ’सोफेनुमा‘ बैंचों पर बैठी भाजपा को अब अपनी विपक्षीय भूमिका का पाठ भी सत्ताधारी पार्टियों से सीखना पड़ रहा हैै।
इस सारे घटनाक्रम में कुल मिला कर भाजपा की ‘नमो नमो चाय’ कैंपेन और कांग्रेस के ‘रागा झुग्गी-बस्ती‘ कैंपेन को केजरीवाल ग्रहण के चलते टी. आर. पी. का सख़्त टोटा पड़ गया है। वहीं चंद मीडिया हाउसों के मालिकों की मजबूरी ये है कि वो जानते हैं कि जो बिकता है वो ही चैनल पे दिखता है। उधर चैनलों के फाइनैंस डिपार्टमेंट अपने मालिकों को कांग्रेस-भाजपा के साथ हुई उन प्रमोशनल डील्स की काॅपी दिखा दिखा कर गा रहे हैं कि, ‘वो उनमें- हममें करार था, तुम्हें याद हो के न याद हो’।

वैसे ये न्यूज़ चैनल्स उन डील्स का निर्वहन करने में पीछे नहीं हैं। मुझे याद नहीं पड़ता कि किस मीडिया ने कब किसी भी सरकार के गठन के मात्र एक महीने पूरे होने पर उस पार्टी के कार्यों की समीक्षा पर इतनी भव्य हैडलाईनें बनायी हों। वो भी तब जब उस सत्तासीन पार्टी ने गोवा के किसी आलीशान रेसाॅर्ट में समारोह आयोजित कर चैनलों के प्रबुद्ध संपादकों को ‘जर्नलिस्टिक टूरिज़्म’ का न्यौता तक न दिया हो। अगर जनतंत्र के इस चैथे स्तंभ के इन चंद कर्णधारों ने इस ही ‘अति चैतन्यता’ का पालन शुरू से किया होता तो आज शायद, और कुछ नहीं ता,े अपनी ही मीडिया इंडस्ट्री को एक पूर्णतः स्थापित इंडस्ट्री में शुमार करवाने में सफल होते। न्यूज़ चैनल्स ने कांग्रेस और भाजपा दोंनों के नेताओं के ज़रिये आप सरकार के चुनाव के पहले किये वादों को पूरा न कर पाने के इल्ज़ामों को खूब हवा दी। आम आदमी पार्टी के नेताओं ने भी खूब जोर शोर से इन इल्ज़ामों को नकारा। पर इन चैनल्स के एक वर्ग का झुकाव नमो-रागा ब्रिगेड की तरफ ही दिखा। ये में इस लिये कह रहा हूं क्योंकि प्राईम टाईम के पैनल डिसकशनों के दौरान आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता अधिकतर ही अपनी बात रखने के लिये संघर्ष करते दिखे। मुझे तो ये समझ नहीं आता कि एैसे पैनल डिसकशन्स को एंकर कर रहे मुखौटों के कान में लगे हैडफोन पर चैनल के संपादक जब चिल्लाते होंगे कि काटो काटो इसको, ये ज़्यादा ज्ञान दे रही/रहा है, ब्रेक लो ब्रेक लो, तो इन मुखौटों की आत्मा ये कैसे गवारा करती होगी कि किसी इल्ज़ाम लगाने वाले को तो पूरा समय दें और आरोपित को सफाई देते वक्त समय की कमी का हवाला दे कर चुप करवा दें। खै़र, इन चैनलों के मुखौटों को भी तो पापी पेट लगा है, उनके बच्चों के महंगे स्कूलों की फीस भी तो जानी है, जैसे अरविंद जी के बच्चों की स्कूल फीस जाती है, बस फर्क ये है कि अरविंद जी के बच्चों की स्कूल फीस का पूरा ब्यौरा मीडिया ने चटखारे लेते हुए प्रकाशित किया, ग़लती केजरीवाल जी की ही है, उन्होंने खुद को एक निरीह ‘आम आदमी‘ क्यों घोषित किया। बढि़या अपने नाम के आगे ’आई. आई. टी.’, आई. आर. एस. लिखवा कर अपनी आलीशान कोठी, माफ करें, कोठियों के सामने टंगवाते और मस्त रहते। ख़ैर, हर किसी चैनल के ऐंकरों को एन डी टी वी इडिया जैसा संपादकीय माहौल नहीं मिल पाता, जहां भारतीय टी वी न्यूज़ जगत के पितामः में से एक विनोद दुआ जैसे खरी खरी सुनानेे वाले संपादक/एंकर को अपना शो करने का एक लंबा अवसर मिला। अब विनोद सर किसी मल्टी नेश्नल न्यूज़ चैनल पर आ रहे हैं उम्मीद है कि उनके शो के पहले चैनल के डिस्क्लेमर में ये पढ़ने को मिले की इस कार्यक्रम का संपादकीय कार्यक्रम के एंकर के साथ सुरक्षित है।

उंट किस करवट बिठायें ‘जनाब’

अरविंद केजरीवाल ने अपनी सरकार के कानून मंत्री के समर्थन में, केंद्र सरकार के मातहत ‘दिल्ली’ पुलिस के ढीठ रवैये के विरोध में जो किया वो एक बार फिर अभूतपूर्व राजनैतिक फैसला था। किसी मुख्यमंत्री का राज्य के पुलिस महकमे के खिलाफ धरना, वो भी ‘दिल्ली की सर्दी’ में, सड़क पर, खुले आसमान के नीचे, एक बहुत ही क्रांतिकारी कदम था। सारा राजनैतिक अमला स्तभ्ध था कि ये क्या हो गया। फिर अराजकता कार्ड खेलने की रणनीति के साथ सारी पार्टियों ने आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल को घेरने का प्रयास किया, और मीडिया ने फिर से निष्पक्षता बरतते हुए इस को खूब प्रचारित प्रसारित किया। असल में जब महाराष्ट्र में मीडिया को एैसी कोई अराजकता दिखती है तो मीडिया ज़्यादा विचलित या उद्वेलित नहीं होती क्योंकि उनको पता है कि वहां के नेता अपने कार्यकर्ताओं समेत ही शाम को चैनल के दफतर में चाय पीने आ धमकेंगे। ख़ैर, अरविंद केजरीवाल ने अपने अराजक रवैये के पीछे जो कारण दिये उनसे देश के हर आम आदमी का रोजाना रूबरू होता है। आम आदमी पार्टी के अभिभावकों ने ये धरने वाला कदम इस लिये लिया की दिल्ली को पूर्ण राज्य का ओहदा दिलवाने की राह में ये एक बहुत सार्थक संदेश साबित होगा। हर आम आदमी ये जानता है कि समाज में उठे किसी भी विवाद को सुलझाने का पहला पड़ाव पुलिस थाना ही होता है और जिस विवाद का हल बिना पुलिस के हस्तक्षेप के हो जाये, वहां, या तो दोंनों पक्ष पढ़े लिखे समझदार होते हैं, या एक पक्ष मज़बूत राजनैतिक पृष्ठभूमि से होता है। वैसे भी राजनैतिक संपर्क/प्रैस से नाता रखने वालों से तो पुलिस की विषेश सहानुभूति होती है। और अगर दोंनों ही पक्ष राजनैतिक कनेक्शन वाले हों तो आॅन डयूटि पुलिस कर्मी फोन मिला कर पूछता है कि ‘जनाब’ उंट किस करवट बिठायें। अब जब बात ‘जनाब’ प्रजाति के पुलिस कर्मियों और उनके सत्ताधारी आकाओं के बीच पंहुच जाती है फिर मीडिया भी अक्सर उस विवाद का मात्र ‘पुलिस वर्जन’ छाप या दिखा कर अपनी जि़म्मेदारी का निर्वहन कर देती है और फिर मामला कोर्ट के गलियारों में फाईल का रूप ले कर सदियों घूमता रहता है। पर एफ. आई. आर. दायर होते वक्त ही मामला लगभग तय हो जाता है। एफ. आई. आर. में दर्ज धाराओं के आधार पर कोई भी वकील या जो पांच सात सालों से कोर्ट या क्राईम बीट कवर कर रहे ‘है रिर्पोटऱ़’ ये भविष्यवाणी कर सकते हंै कि इस केस का नतीजा किस के पक्ष में आयेगा।

ख़ैर, केजरीवाल जी ने अपने उपर लगे अराजकता केे इल्ज़ामों को जीवंत करते हुए ये बयान दिया कि छब्बीस जनवरी को राजपथ पर लाखों प्रदर्शनकारियों का जनसैलाब होगा। शिंदे साहब को केजरीवाल के इस क्रांतिकारी आहवान के दूरगामी दुष्परिणाम भांपने में ज़्यादा समय नहीं लगा और उन्होंने ये रिस्क न ही लेने का फैसला लेते हुए ‘बीच का रास्ता’ निकाला और पांच में दो पुलिस अधिकारियों को र्फोस्ड लीव पर भेज देना ही बेहतर समझा। केजरीवाल जी ने केंद्र के जंगी एल. जी., नजीब जंग के पत्र के हवाला देकर, आंशिक रूप में ही सही, अपना वांछित लक्ष्य पा लेने में सफलता की उदघोषणा की और उन्होंने अपने समर्थकों में इन पंक्तियों को मूर्तरूप कर दिखाया कि, ‘सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक्सद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिये‘।

विकास ठाकुर

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