ये खिचडी स!क्रान्त,निमन्त्रण  है  खिचडी सरकारो! की

भभक  रही  है आग  लोहडी मे!, सत्ता गलियारो! की

ये खिचडी स!क्रान्त,निमन्त्रण  है  खिचडी सरकारो! की
भभक  रही  है आग  लोहडी मे!, सत्ता गलियारो! की
आज अमेठी, बनी  अ!गेठी, षीत  लहर  सरदारो! की
बा!ट  रहे  है!, सभी  रेवडी, नारो! मे! मक्कारो! की

चैराहो!   मे!  बैनर, पोस्टर, सभी  बधायी ,खायी मे!
ये न!गे, भूखे  नेता  घूमे! कोट,  पेन्ट  और टाई मे!
राजनीति  के  दुष्मन  आपस  मे! आलि!गन  करते है!
वाह  रे, खिचडी,  तेरे  कारण, कितने  टुच्चे  तरते है!

अच्छा  होता, प्रजातन्त्र   की  सोच  प्रजा मे! आ जाती
आज भेडियो! की नष्ले,जनमत  की  खिचडी  ना खाती
आग मे!लोहडी की तप कर,कुछ चि!तन,म!थन भी होता
प्रजातन्त्र  का  मालिक, सडको  पर  लावारिस  ना रोता

त्योहार  मनाये  जाते है!, सम्पन्न, समर  स!सारो! मे!
नेता जी  खिचडी, ढू!ढ  रहे,भारत  मे! भूख के मारो! मे!
कई   करोड़  के  खर्चे   है!, चुनाव, चरण  परचारो! मे!
षाम  को  दारू, अय्यासी, होती  है , मिलकर  यारो! मे!

त्यौहार  बने  थे ,सम्प्रदाय  सब  मिलकर  खुषी मनाये!गे
ये  राजनीति   के   नरभक्षी,  ना  कौम , कबीले खाये!गे
त्यौहार, तालाबो!  के  डबरे, घुट-घुट   के  मनाये जाते है
कुछ हिन्दू है!,कुछ  मुस्लिम है!, कौमो से  गिनाये जाते है

त्यौहार  मे!  बोटो!  की  गिनती,नेता की आ!ख से होती है
सम्प्रभुता मेरे  भारत की, क्यो!  उत्सव  से मे! भी रोती है
त्यौहार  हमे!  भी  भाता  है,आडम्बर  से  कुछ  हटकर हो
कवि‘आग ’के  छन्द  पढो, बस,भाव  हृदय  मे! डटकर हो!!
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