कहीं पर हाथ भारी है कहीं पर फूल भारी है, धरम में देख लो अन्धे कहीं त्रिषूल भारी है, सड.क पर राम को लाना ये कैसी भूल भारी है, कहीं घनष्याम, ईषा है कहीं रसूल भारी है

कहीं पर हाथ भारी है कहीं पर फूल भारी है
धरम में देख लो अन्धे कहीं त्रिषूल भारी है
सड.क पर राम को लाना ये कैसी भूल भारी है
कहीं घनष्याम, ईषा है कहीं रसूल भारी है

जहां पर हाथ की सत्ता, उंगली पांच भारी है
धरम निर्पेक्ष की बातें ,सुलगती आंच भारी है
कहीं पर ख्ेांल मुल्ला का गरीबी है कहीं मुद्दा
पुराने यार की बातें यहां तो नार भारी है

communal दल  गत   साम्प्रदायिकता

बातें तो अहिंसा की यहां हर हाथ में असला
पुरखों की धरोहर को कैसे हाथ से मषला
कहीं दी राम ने माया कहीं घनष्याम ने छाया
जो विधि का विधाता है उ सी के हाथ में तषला

हमारी श्रृश्टि के नायक ने मानव ही बनाया है
अपनी दृश्टि में उसने ना दानव पन दिखाया है
षरारत नेता की देखो बनी हर देष में सीमा
मकड.ी जाल ये कैसा अब नक्षे में छाया है

दुनिया एक करनी हो तो नेता दूर हों जग से
अमनऔर चैन तब होगा ये चकनाचूर हों जग से
दबिष जनता की एसी हो,ये मजबूर हों जग से
बनादो एक ही धरती चमन भरपूर हो जग से ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा‘आग’

Image Source: Supplied By Author – Sources Are Unknown

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