नीले आसमाँ के आगोश में, बादलों से टकराती हुई इठलाती बलखाती ये पतंग, बाहें खोले यूँ उड़ रही कभी यहाँ, कभी वहाँ, हवा के संग चली जाने कहाँ अल्हड़ जवानी सी मचलती, बुलंदी पर यूँ जा पहुँची भूल कर उस डोर को, थामा जिसको किसी और ने इसे नचाता हैं जो, उँगलियों के कुछ इशारो […]

नीले आसमाँ के आगोश में, बादलों से टकराती हुई
इठलाती बलखाती ये पतंग, बाहें खोले यूँ उड़ रही

कभी यहाँ, कभी वहाँ, हवा के संग चली जाने कहाँ
अल्हड़ जवानी सी मचलती, बुलंदी पर यूँ जा पहुँची

भूल कर उस डोर को, थामा जिसको किसी और ने
इसे नचाता हैं जो, उँगलियों के कुछ इशारो पर

इंसान भूले जा रहा है वेसे, अपने परवर दिगार को
जिसने इसे रचाया बस, मिटटी के चन्द ज़र्रो से

कच्चे ये धागे है, इरादे मगर मजबूत है इनके
पतंग को इतना यकीं, जाना है सितारो से आगे

इन्सान और पतंग कि फितरत कुछ एक सी है
दोनों बंधे इक डोर से, होंसले मगर आज़ाद है

खुले आकाश में देखा, कई तितलियाँ नज़र आई
गौर किया जब मेने, रंग बिरंगी पतंगे उभर आई

साथ उड़ती है इक दूजे के, मिलकर ये सभी पतंगे
बारी आई कटने कि, पराई सी फिर क्यूँ वो लगती

हवाओ कि ज़ुम्बिश में, खुशियाँ सब फैलाती हुई
लहराती झूमती ये पतंग, बंदिशे तोड़े यूँ उड़ रही है

नीले आसमाँ के आगोश में, बादलों से टकराती हुई
इठलाती बलखाती ये पतंग, बाहें खोले यूँ उड़ रही…

-इरफ़ान “मिर्ज़ा”

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