प्रिय मित्रो!              मै! टी0वी चैनल व समाचार पत्रो! मे! आजकल निरन्तर बलात्कार के उपर चर्चाये! सुन रहा हू!,इस पर थोडा सा अपना अनुभव आपको बा!टना चाहता हू!,साथियो!,काम,क्रोध,लोभ,मोह,अह!कार,परमात्मा ने हर जीव को दिया है,यदि किसी के अन्दर इन विकारो! की कमी होती है तो समाज मे! उसे नपु!सक  कह कर […]

प्रिय मित्रो!
             मै! टी0वी चैनल व समाचार पत्रो! मे! आजकल निरन्तर बलात्कार के उपर चर्चाये! सुन रहा हू!,इस पर थोडा सा अपना अनुभव आपको बा!टना चाहता हू!,साथियो!,काम,क्रोध,लोभ,मोह,अह!कार,परमात्मा ने हर जीव को दिया है,यदि किसी के अन्दर इन विकारो! की कमी होती है तो समाज मे! उसे नपु!सक  कह कर पुकारा जाता है,इन विशयो! को समाप्त नही किया जा सकता,केवल ज्ञान ही से परिवर्तित किया जा सकता है,और हमारे षास्त्रो! मे! वह विधी विद्यमान है,परन्तु उसको पढने पढाने वाले प्रायःलुप्त हो गये है!,पूर्व मे! ग्ुारूकुल व्यवस्था मे! ये सभी ज्ञान विद्यमान थे, जो अब षास्त्रो! तक ही सीमित रह गये ह!ै,

          एक सुन्दर फूल का खिलना भी वााषना का ही कारण है,प्रकृति मे! जो भी सौन्दर्य है वह किसी ना किसी रूप मे! वाषना से ही आता है,कवियो! के गीतो! मे! व उपन्यासो! मे! भी वााषना ही मूल है,तो क्यो! ना उस ज्ञान को पुनः पुर्नजीवित किया जाये जिससे ,इन विकारो! को परिवर्तित कर इनका सद उपयोग किया जा सके,इस विशय को निन्दित करके हम आग मे! घी डालने का काम कर रहे है!,मेरा निवेदन है कि पुनः बुद्विमान वर्ग बैठ कर इस व्यवस्था को व्यवस्थित करने मे! राश्ट्र हित मे! अपना अमुल्य योग दान दे!!,

इसी व्यवस्था पर एक व्य!ग प्रस्तुत कर रहा हू!,इस व्य!ग मे! किसी की घार्मिक भावनाओ को आहत करने का मेरा कोई उद्वेष्य नही है,

सतयुग,त्रेता,द्वापर, कलियुग  बलात्कार से  बच पायेगा
वेद,षास्त्र,गीता,रामायण,क्या फिर हमको  पच पायेगा
बलात्कार  तो  आदिकाल से भू-मण्डल  मे! होता आया
इस युग मे! कानून खडा है,उस युग मे! सब ठीक ठहराया

गौतम  पत्नि, इन्द्र  देव  की  चर्चा जगह-जगह होती है
माता  सीता  त्रेता  युग  मे!  आरोपो!  को  क्यो!  ढोती है
द्वापर  मे! तो  वर्ण -ष!करो  की  लाइन  सी  लगी पढी है
इस कलियुग  मे!  नारी  ही क्यो! चैराहो! मे! आज खडी है

बलात्कार  तो  त्रेता  युग  मे!  सूपर्णखा  से  भी होता है
नाक, कान  को  काटने वाला नैतिकवादी क्यो! होता है
माता सीता  यति, सती है फिर भी ज!गल क्यो! जाती है
व्यभिचार की सभी धारणा धर्म,कर्म क्यो!  बन जाती है

सत्यवती  की  सन्तानो! का  द्वापर युग  मे! क्या कारण है
 कर्ण कश्ट को भोग रहा  था षास्त्र य!हा पर उच्चारण है
दुर्योधन  तो  पा!च -पाण्डवो!   पर   भी  प्रष्न  उठाता है
पारासर  और  व्यास  ऋशि  पर  भी  तो षक गहराता है

दुर्वााषा   की  भ!ग   तपस्या , एक  अप्सरा  से  होती है
दुश्यन्तो!  की कामवााषना, षकुन्तला  ही  क्यो! ढोती है
ग्रन्थ कथा  बनती  जाती  है,व्यभिचार  दबता  जाता है
स!विधान क्यो! बलात्कार की  परिभाशा को समझााता है

साहित्य जगत मे! वैषाली की नगरवधु क्यो! छा जाती है
चन्द्रगुप्त  की  विश-कन्याये! ,क्या-क्या  खेल रचाती है!
बलात्कार   तो  राजा, महाराजाओ!  का ही षौक रहा है
वेैभवता  मे!  काम-वाषन  इस  भारत  का  चैक रहा है

आषूमल  आरै नारायण का बलात्कार भी जग जाहिर है
गृहस्थी  तो  बदनाम  हुये!  है!, ब्रह्मचारी   इसमे!  महिर है!
इस  दुनिया  मे!  बलात्कार  करने  की  उम्र  नही होती है
व्यभिचार को  जन ,समाज  की भवुकता ही तो ढोती है

कम,क्रोध,मद,लोभ,मोह  ही  पुरूश-तत्व को दर्षाता है
इन विशयो! का ज्ञानध्यान भी मानव से छन कर आता है
प्!ाच विकारो! के  परिणय  का  सूत्र  ढू!ढ  कर  लाना होगा
कवि आग  को नैतिकता  का  प्रष्नचिह्न समझााना होगा ।।
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