भारत के संसद मेंकम-प्रतिनिधित्व समूहोंकी पहचान केलिए सबसेपुराना मानदंड जाति है.

भारत के संसद मेंकम-प्रतिनिधित्व समूहोंकी पहचान केलिए सबसेपुराना मानदंड जाति है. मूलभूत सिद्धांत यह हैब्रिटिश शासकों ने भारतीय समाज को विभाजित करने के लिए समय-समय पर ऐसे वर्गों को चिन्हित किया जिन्हें वे अपने लिए उपयोगी और सहायक समझते थे। शेष समाज को उन्होंने सामान्य श्रेणी कहा। इसी में से अल्पसंख्यकवाद और बहुसंख्यकवाद पैदा हुआ।

१८९१ के भारत जनगणना आयुक्त से जब पूछा गया कि हिन्दू की व्याख्या क्या है, तो उन्होंने कहा कि मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन, निचली जातियां, पहाड़ी व जनजातियों आदि को निकालकर जो बचता है उसे हिन्दू कह सकते हैं भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के संविधान में जिन निम्न जातियों को अनुसूचित जाति, में सामिल किया गया उनसे भी निम्न एवं अस्पृश्य, समाज की घोर शोषित जाति महापातर यूपी,बिहार,मध्यप्रदेश क्या सम्पूर्ण भारत में महापातर जाति ऐतिहासिक रूप से अस्पृश्य एवं शोषित रहे और उन्हें भारतीय समाज में सम्मान तथा समान अवसर नहीं दिया गया और इसीलिए राष्ट्र-निर्माण की गतिविधियों में इनकी हिस्सेदारी नगण्य रही इसी विषय पर मैं कहना चाहता हूं कि भारत के अस्पृश्य जाति समाज में से सबसे मुख्य अस्पृश्य जाति महापातर को इस अनुसूचित जाति में शामिल हि नही किया गया,जिसे समाज का हर वर्ग जानता है कि ये जाति आज भी समाज में व्यावहारिक रूप से अस्पृश्य है, यह जाति समाज के तथाकथित लोगो के मरणोपरान्त निकृष्टदान लेकर अपना गुजर-वसर करती है ।जबकि समाज के अन्त्योष्टि कार्यक्रम में लगे हुये प्रत्येक जातियां, जैसे डोम,धरकार,धोबी,मुसहर,कहार, कुम्हार, नाई और महापातर इनमे से किसी भी जातियों से कोई भी सामाजिक सह-सम्बन्ध नही होता. ये ठीक पशु के सिहं जैसा होते हे जैसे पशुऔं के सिघों में कोई भी आपस में सह-सम्बन्ध नही होता. ठीक उसी प्रकार से इन जातियों में है. ये सभी जातियां हमारे संविधान के द्वारा आरक्षित है.

जबकि महापातर जाति को छोड दिया गया, सोचिये कैसी विडम्बना है. समाज का सवसे निकृष्ट जाति, जो सर्वविदित है, संविधान में इस जाति को अनुसुचित जाति में नही डालागया, केवल जातिय भेद-भाव एवं संविधान में इस जाति का प्रतिनिधित्व न होने के कारण.

यह जाति शदियों से उपेक्षित चली आ रही है, कुछ महापातर जाति के लोगो में अच्छी योग्यता होने के बावजूद नियुक्ति के अच्छे अवसर नही पाते है और उनके साथ जातिगत आधार पर स्कूल में सरकारी कार्यालयों में भेदभाव किया जाता है ।जबकि संविधान में जातिय गणना के आधार पर प्रतिनिधित्व होना चाहिये था.

प्रत्येक राज्य को उसकी आबादी के आधार पर सद्स्य मिलते है. लेकिन इस महापातर जाति का कोई न तो गणना किया गया न तो कभी देश के संविधान में इनको प्रतिनिधित्व के लिये चुना गया. इसका कारण हमारे संविधान में लगभग 50 सालों से एक ही विचारधारा एवं एकही परिवार के व्यक्तियों का वर्चस्व रहा इसलिये ये सभी मिलकर शदियों से इस महापातर जाति को समाज में अश्पृस्य बनाये रहे, जिसे पूरा प्रदेश और समाज ही नही बल्कि पूरे भारत कि जनता जानती है, कि यह जाति समाज की उपेक्षित एवं अश्पृस्य जाति है. यह सर्वविदित है आप भी जानते होगें यदि इस जाति के शुभचिन्तक होंगे तो , समाज के सबसे निम्न जाति जिसे आप चमार और डोम कहते है जिसका संविधान में अनुसूचित जाति का दर्जा है, वह भी समाज के किसी शुभकार्य में किसी के दरवाजे जाकर सम्मान पा सकता है लेकिन यह जाति महाब्रह्मण, सवाल ही नही उठता कि किसी के शुभघणी में सम्मान पा जाये, कितना शर्मनाक है हमारे भारतीय संविधान में, इस प्रकरण पर आप सबको चिंन्तन करना होगा तथा इस जातिवर्ग के उत्थान, आर्थिक एवं सामाजिक विकास के लिये सोचना होगा. इनको संसद में प्रतिनिधित्व कभी भी नही दिया गया. प्रतिनिधित्व तो गया दरकिनारे इनके पास तो इतना भी पैसा नही है कि ये दो जून की रोटी खासके. 35 प्रतिशत भी साक्षरता नहीं है.

आचार्य वेलफेयर सोशाईटी ने पूरे ऊत्तर–प्रदेश मे इस जाति का गणना कराया, इस जाति की कुल 2578934 जनसंख्या है. इसमें से 5432 लोग नौकरी में लगे हुये है शेष अस्पृश्य लोग है, जो परम्परागत कार्य में पागलो जैसा भटक रहे है,इनकी महिलाये और बच्चे अधिकतम कुपोषण की शिकार है पूर्णतः अशिक्षित वर्ग है, समाज में इस जाति को कही बैठने पर सम्मान कौन कहे इन्हें देखना पसन्द नहीं करते, तथाकथित वर्ग तो इनको देखने से ही अपने को अशुभ मानता है. जबकि भारतीय संविधान के 84 वे संशोधन के आधार पर

जाति जनगणना के आधार पर सदस्य स्थान निर्धारित होते है फिर भी भारतीय संविधान में इस जाति का कोई भी प्रतिनिधित्व नही है, हमें इस जाति के आर्थिक एवं सामाजिक विकास पर सोचना होगा.

डा. शंकर देव.

फाउन्डर आचार्या वेलफेयर सोसाईटी.

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