Voice of Aam Aadmi party initiated by none other than Arvind Kejriwal is here to stay. Read to know how AAP’s initiative helped BJP to win the 2014 election

2014 के आम चुनावों के परिणाम देश की राजनैतिक बिरादरी के आगे ये सवाल ज़रूर खड़े कर रहे हैं कि, आखिर किसके अच्छे दिन आने वाले हैं ? खासकर अब जब भारत सरकार को ‘‘आलू प्याज़’’ का शुमार भी ’आवश्यक वस्तुओं’ की सूचि में करना पड़ा है। भारतीय राजनैतिक इतिहास में, हर सरकार को काला बाज़ारी, काला पैसा, काली करतूतों, जैसे राजनैतिक बायप्रोडक्ट्रस का खामियाज़ा समय समय पर भुगतना पड़ा है।

जनता ये सवाल भी करेगी कि, क्या हर वो हाथ, जो आज भी अपना हक ‘मांगने‘ की अवस्था में है, को, ‘शक्ति और तरक्की‘ सुनिश्चित होगी ? इन चुनावी नतीजों ने कांग्रेस पार्टी को लाइन हाजि़र करवा कर भाजपा को देश का एकलौता राजनैतिक हुड़-हुड़ दबंग बना दिया। मोदी जी मन ही मन ये ज़रूर कहते होंगे कि, ‘बाग़ीचाए अतफाल है मीडिया मेरे आगे‘। असल में, देश में जनतंत्र के चैथे स्तंभ की ताकत का सही मुज़ाहिरा, अन्ना जी के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और उसके बाद, अरविंद जी की आम आदमी पार्टी के दिल्ली में सरकार बना लेने के बाद हुआ।

Aam Aadmi Party Leader Arvind Kejriwal Addressing a Press Conference मत कत्ल करो आवाज़ों को

Aam Aadmi Party leader Arvind Kejriwal addresses a press conference after declaration of Delhi Assembly Poll results in New Delhi on Dec.8, 2013. (Photo: IANS)

और भाजपा ने, लोहा गरम देख, सही समय पर, मीडिया के माध्यम से भारतीय जनभावनाओं को अपने पक्ष में भुनाने की सटीक रणनीति का अचूक इस्तेमाल करते हुए, भोजपुरी और बांग्ला गायकों को भी मोदी बना कर बेचने में अभूतपूर्व सफलता पायी। यानि कि, जो अभूतपूर्व तरीके से चैनलों पर दिखा, वो अभूतपूर्व तरीके से चुनावी बाज़ार में बिका। और वैसे आज देश में आम आदमी पार्टी के अभिभावकों को छोड़, किसी भी राजनैतिक पार्टी के आला नेताओं के कन्धों में इतनी उंचाई नहीं बची है कि वो मीडिया के गगनचुंबी रीले-टावरों का मुकाबला कर सके। विडंबना ये भी है कि अब यही मीडिया, 2014 चुनावों मेें भी कांग्रेस और भाजपा द्वारा खड़े किये गये आपराधिक छवि वाले प्रत्याशियों पर टिप्पणी कर रहा है।

आम आदमी पार्टी को कवर कर रहे रिर्पोटरों को, शायद, आषुतोश या शाजि़या जी की बाईट लेते वक्त, मन ही मन, थोड़ा सा अपराधबोध तो ज़रूर होता ही होगा। जिनको नहीं होता, शायद उन्हीं से श्रीमती अरविंद केजरीवाल ने ये कहा था कि, मत भूलिये कि आपके बच्चे भी ये सब देख रहे हैं। पर जिनको होता है, वो कभी न कभी मशहूर शायर अहमद फराज़ की लिखी हुई नज़्म ‘मत कत्ल करो आवाज़ों को‘ ज़रूर पढ़ेंगे।

इन लोकसभा चुनाव परिणामों की महत्ता इस लिये भी अहम है क्यांेकि इस बार संसद में, मात्र डेढ़ साल पुरानी ‘आम आदमी पार्टी‘ के ‘चार सांसद‘ भी शामिल है।

और पार्टी ने अपने छोटे से, पर मेहनतकश चुनाव प्रचार में भी देश भर में एक करोड़ से ज़्यादा वोट हासिल किये हैं। तो, इस बात की देेश के हर ‘आम आदमी‘ को, ‘पार्टी तो बनती ही है‘ क्योंकि अब हिदुस्तान भर में, चार सौ से ज़्यादा ‘विशुद्ध केजरीवाल ब्रांड‘ के, मात्र समाजसेवी नहीं, ‘‘नेता‘‘ मौजूद हैं, जो चोर को चोर कहने की हिम्मत और माद्दा रखते हैं। जिनके पास राजनीति में प्रवेश करने के लिये प्रमुख परंपरागत अहर्ताएं जैसे, धार्मिक-सांप्रदायिक अलगाववाद, भ्रष्टाचार, गुंडई, बलात्कार आदि आदि विधाओं में से किसी में भी, किसी भी मान्यता प्राप्त थाने या कचहरी से, कोई भी डिग्री या डिप्लोमा नहीं है।

Aam Aadmi Party logo.svg मत कत्ल करो आवाज़ों को

‘आम आदमी पार्टी‘ एक एैसी नवजात राजनैतिक पार्टी, जिसने अपनी बुज़ुर्ग पार्टीयों को अपनी तर्ज पर ‘टोपी‘ पहनने पर मजबूर किया और दिल्ली की एक कद्दावर पूर्व महिला मुख्यमंत्री को राजनैतिक ‘हाइबरनेशन‘ पर भेज दिया। आम आदमी पार्टी ने, वर्षों बाद, बड़ी बड़ी पूरानी राजनैतिक पार्टियों को इस बार अपने ’कार्यकर्ता‘ की याद दिलाई। भारतीय राजनीति के इतिहास में शायद ये पहली बार हुआ होगा कि किसी पार्टी ने चुनाव में जीत के बाद, विशेष आयोजन कर अपने ‘कार्यकर्ताओं‘ को पुरूस्कृृत किया हो।

असल में ‘पार्टी कार्यकर्ता‘ तो एक एैसा विलुप्तप्राय वर्ग था जिसका स्थान इवेंट मेनजमेंट कंपनियां या दलाल लेते जा रहे थे। भाड़े की भीड़ को कार्यकर्ता बता कर काम चल रहा था, एैसी भीड़ जिसको उनके इलाके के छुटभैये नेता चाय नाश्ते और परिवहन का खर्चा देकर हकाल लाया करते थे। एैसी भीड़ जिसको शायद देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति का नाम तक न मालूम हो, पार्टी लाइन वगैरह तो दूर की बात है। एैसी भीड़ जो, नेता जी, जिसको सुनने वो लाई गयी है, के भाषण के दौरान अगर लंगर खुल जाये तो भाषण छोड़ खाने के लिये दौड़ पड़ती है।

सत्ता में आयी भाजपा के, वाजपेयी स्टाईल में बोलने वाले, राजनाथ सिंह को पार्टी की जीत के बाद आयोजित पहली ही प्रैस कांन्फ्रेंस में, अपने कार्यकर्ताओं को तल्ख़ अंदाज़ में बाहर का रास्ता दिखाते हुए देखा गया। राजनाथ जी अपने कार्यकर्ताओं को ‘अनुशासन‘ में रहने की नसीहत देते हुए, ये कहते सुनायी दिये कि, किसी भी वर्ग विशेष के खिलाफ कोई भी आपत्तिजनक नारेबाज़ी न की जाये। शायद अपने इतिहास से सबक लेने का ये अच्छा उदाहरण है।

और राजनाथ जी ये भी बखूबी समझते हैं कि, आज के राजनैतिक परिवेश में, जब ममता दीदी, जयललिता, आम आदमी पार्टी के सांसद विपक्ष मेें बैठे होंगे, तब, ‘पूर्ण बहुमत‘, संसद में लगी सत्तापक्ष की सोफेनुमा बैंचों में, रोज़ाना चुभने वाले कांटों का काम करेगा। अब विपक्ष इस ही ‘पूर्ण बहुमत‘ की दुहाई दे कर साफ साफ कहेगा कि, ‘नो उल्लु बनाविंग‘। भाजपा और नरेंद्र भाई जी मोदी को अब फैसले ‘ब्लैक एंड व्हाईट‘ में लेने होंगे।

वैसे देखा जाये तो 2014 लोकसभा चुनावों में बदलाव के नाम पर, सिर्फ एक ही बदलाव आया, और वो है, ‘पूर्ण बहुमत‘। शेष सिर्फ इतना ही हुआ कि, ‘कांग्रेस‘ की जगह ‘भाजपा‘ ने ले ली है, जिसके सांसद पिछले दस सालों से सत्ता की भूख से एकल बेकल हैं। देखना होगा कि मोदी जी दूध की रखवाली पर, सालों से भूखी बिल्लीयां बिठा कर, पूर्ण बहुमत के मलाईदार अच्छे दिन किस के लिये लाते हैं ?

और इस ‘अदला बदली‘ के पीछे अगर कोई एक सशक्त कारण है तो वो है ‘आम आदमी पार्टी‘ की सत्तारूढ़ भ्रष्टाचारियों के खिलाफ खुल्ली चुनौती। सत्तारूढ़ कांग्रेस के खिलाफ जिस मज़बूती से केजरीवाल जी ने आंदोलन किया और कांग्रेस की दिल्ली के चुनावों में बख्खियां उधेड़ीं, उसका फायदा भाजपा ने उठाया। अब कोई पूछे कि संघर्ष आम आदमी पार्टी का, और फायदा भाजपा का

Aam Aadmi Party मत कत्ल करो आवाज़ों को

तो इसका जवाब है कि, राजनीति में दो और दो चार नहीं होते और आजकल उसका कार्पाेरेटाइज़ेशन होने के चलते इसमें ‘एफ. डी. आई’ , यानि ‘फौरन डर्टी इन्वेस्टमेंट‘ की ज़रूरत बढ़ गयी है, जो ‘आम आदमी पार्टी‘ के शब्दकोश में है ही नहीं। और भारतीय मतदाता को, आज भी, पार्टीयों और मीडिया द्वारा, व्यक्तिगत ‘शार्ट टर्म फायदे‘ की रातनीति परोसी जा रही है। वो मतदाता, जो अपनी केबल या डिश पर, सबसे ज़्यादा टी आर पी वाले या सबसे बेहतरीन जी एफ एक्स के साथ उंची आवाज़ में, समोसा जलेबी बेचने के अंदाज़ में खबरें सुनाने वाले  न्यूज़ चैनल्स की खबरों को सच मानता है।

कभी कभी सोचता हूं कि देश में प्रजातंत्र के प्रहरी अगर यूं ही अपनी तलवारें बेच या गिरवी रख कर काम करते रहे तो, आड़वानी जी के हाल ही के बयान कि, ‘‘मोदी जी से चुनावों में जीत के बाद पहली मुलाकात पर उनकी आंखों में आंसू थे‘‘, का विष्लेषण कौन करेगा ? कौन साफ साफ ये पूछेगा की वो आंसू दुख के थे या खुशी के ? मेरे ख़याल से ये प्र्रश्न, मौका मिलने पर, वो पत्रकार ही पूछ सकते हैं, जो एक मल्टी नैशनल चैनल के प्राइम टाइम पर बीस मिनट का अपना कार्यक्रम, बिना किसी इश्तेहार के, निर्बाध प्रसारित करवा रहे थे, पर अब शायद उन्होंने अपनी कलम चैनल से छुड़वा ली है।

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि, मोदी जी ने डिज़ायनर कपड़ों में ही सही, केजरीवाल जी की मेहनतकश, धूल मिट्टी में पसीना बहा कर गरीब की राजनीति करने वाले जुझारू नेता वाली छवि की भरपूर नकल करके, हैलिकाप्टरों और टी वी न्यूज़ चैनलों में अकूट खर्चा कर, अपना ब्रैंड और ‘अच्छे दिनों‘ के सपने बेचने में सफलता पायी।

बाकी बदलाव के नाम पर कुछ भी नहीं हुआ। हर चुनाव की भांति इस बार भी शराब, साड़ी, नोट, आदी आदी से वोटों की खरीद फरोख़्त बदस्तूर चालू रही। हर बार की तरह विरोधियों के वोट काटने के लिये फर्जी उम्मीदवारों को खड़ा किया गया। बदलाव के नाम पर एक और बात ये हुई कि कांग्रेस बीट पर काम कर रहे चैथे स्तंभ के प्रहरियों ने, न जाने किस दबाव या अभाव में, चुनाव पूर्व के दो महीनों में मीडिया़ चैनल्स पर चल रहे नमो-नमो सोप का कोई दमदार कांग्रेसी सीक्वेल नहीं उतारा।

हालांकि आम आदमी पार्टी ने सभी लोकसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े नहीं किये, मगर जिस भी लोकसभा क्षेत्र की आवाम को ये विकल्प मिला, उसमें इस आत्मविश्वास का संचार ज़रूर हुआ होगा कि आम आदमी भी राजनैतिक फैसलों का हिस्सा बन सकता है और ये भी कि, समाज के अच्छे और ईमानदार लोग भी एम. पी., एम. एल. ए. और पी. एम. तक बन सकते हैं। अगर इन आम चुनावों में आम आदमी पार्टी को मिले वोटों के प्रतिशत को देखें तो, पार्टी की उम्र के मद्देनज़र, ये वोट प्रतिशत, किसी पूर्ण बहुमत से कम बड़ी उपलब्धी नहीं है।

Arvind Kejriwal Ramlila Grounds मत कत्ल करो आवाज़ों को

Aam Aadmi Party (AAP) National Convener Arvind Kejriwal meet auto drivers during a protest rally against the Delhi and UPA governments for rights of auto drivers at Ramlila Ground in New Delhi on March 14, 2013. (Photo: IANS)

दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार के छोटे से कार्यकाल में कई एैसे वाकये सामने आये, जिनकी विवेचना करने पर ये तथ्य सामने आता है कि राजनेता या कह लो भ्रष्ट नेता और उनकी एंसिलरीज़, जो उनके मार्फत ‘हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे‘ की रणनीति के तहत देश को लूट रहे हैं, को ‘आम आदमी‘ से मिली ये चुनौती और प्रतिसपर्धा कतई रास नहीं आयी।

उदाहरण के तौर पर आम आदमी पार्टी के कानून मंत्री और दिल्ली पुलिस के एक अफसर के बीच, दिल्ली के खिड़की एक्सटेंशन इलाके में हुई बहस, भारतीय राजनैतिक पटल पर हुई एक एैसी अभूतपूर्व घटना है जिसको शायद उसका सही विष्लेशण नहीं मिल पाया। एक निष्ठावान मंत्री, एक तटस्थ पुलिस अधिकारी को उसके कर्तव्य पालन का, कड़े शब्दों मे,ं आग्रह करता है और वो अधिकारी उसे दुराग्रह का नाम दे कर मंत्री जी को अपनी सीमाओं में रहने की चेतावनी देता है। क्या बात है। अमूमन, मंत्री जी तो छोडि़ये, उनका ड्राईवर ही पुलिस को आधा मंत्री नज़र आता है।

यहां, आज तक के एक पत्रकार की इन पंक्तियों का उल्लेख करने की बनती है कि,
ग़नीमत है शहर वालों, लुटेरों से लुटे हो तुम,
हमें तो गांव में अक्सर दरोगा लूट जाता है।
और इन ही ने शायद पुलिस महकमे की दुविधा पर लिखा है
‘ज़रा ‘पाने‘ की चाहत में बहोत कुछ छूट जाता है,
नदी का साथ देता हूं समंदर रूठ जाता हैैै।

अरविंद केजरीवाल जी के दिल्ली सरकार में 49 दिनों के कार्यकाल की तुलना, 1996-97 में सी. बी. आई. डायरेक्टर रहे जोगिंदर सिंह जी के कार्यकाल से की जा सकती है, जिन्होंने अपने छोटे से कार्यकाल का ब्यौरा अपनी किताब ’इनसाईड सी. बी. आई’ में दिया है। सिंह साहब की ये किताब देश के राजनैतिक दलों, राजनेताओं और अफसरशाहों में फैले भ्रष्टाचार के कैंसर को उजागर करने की दिशा में एक मील का पत्थर है। इस किताब को पढ़ने के बाद, मुझे व्यक्तिगत तौर पर, देश के कुछ दिग्गज राजनेता, ‘अबे ए आम आदमी‘ बोल कर, अपनी कमर मटका-मटका कर चिढ़ाते और ठेंगा दिखाते हुए प्रतीत होते हैं।

मुख्यमंत्री के तौर पर केजरीवाल जी द्वारा लिये गये सबसे सार्थक फैसलों में एक था, दिल्ली के एक पुलिस कर्मी की डयूटी के दौरान हुई मौत पर उसके परिवार को एक करोड़ रूपये की वित्तीय सहायता। दिल्ली पुलिस पर, अन्य राज्यों की पुलिस के विपरीत, सारा नियंत्रण केद्रीय सरकार का है, फिर भी दिल्ली सरकार ने देश के एक सुरक्षा कर्मी की डयूटी के दौरान हुई मौत पर उसके परिवार को एक करोड़ रूपये, बतौर श्र˜ा सुमन प्रदत्त किये। ये फैसला और राशि, दोनों ही, अपने आप में अभूतपूर्व हैं।

एैसे ही केजरीवाल सरकार का देश के सबसे बड़े औद्योगिक घरानों में से एक के मालिक के उपर केस दर्ज करने का फैसला भी अभूतपूर्व था। ये वो लोग हैं जो देश के दोनो प्रमुख राजनैतिक दलों के नेताओं को अपनी जेब में रखने का दावा करते हैं। जिन्होंने देश में व्यापारियों को बताया कि ‘जिसकी लाठी उसकी ‘गैस‘। लाठी चाहे वो राजनैतिक हो, प्रशासनिक हो, लठैतों की हो या कोई और, सब लाठियों को पिलाने के लिये उपयुक्त तेल इन औद्योगिक घरानों के पास मिलता है।

इन आम चुनावों में आम आदमी पार्टी को पड़े वोटों को, कम से कम, दस से गुणा कर के आंका जाना चाहिये। ये में इस लिये कह रहा हूं क्योंकि आम आदमी पार्टी का वोटर, चुनावों, प्रजातंत्र, वोट की महत्ता, और सर्वोपरी पार्टी के प्रति अपनी निष्ठा के महत्व को बखूबी समझता है। देखना ये भी होगा कि दिल्ली में होने वाले विधानसभा चुनाव, जिन पर केंद्र सरकार अनिर्णनय की स्थिती में है, इस उम्मीद में कि जनता की याददाश्त बड़ी छोटी होती है, में आम आदमी पार्टी के वोटर अपनी पुरानी निष्ठा बरकरार रखते हैं या नहीं।

अरविंद केजरीवाल जी को दिल्ली के एक न्यायालय ने उनकी न्यायसम्मत हठधर्मिता की बिनह पर तिहाड़ जेल भेजना मुनासिब समझा और इसके बावजूद भी उन्होंने भाजपा के भावी शरद पवार की पावर से डरे बिना, उनसे कोर्ट में सुलहनामा नहीं करने का सै़द्धांतिक फैसला लिया। अरविंद केजरीवाल जी का दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी से इस्तीफा देना सही या गलत था, ये विषय डिबेटेबल हो सकता है, पर उनके इस फैसले पर मुझे श्री कैफी आज़मी जी के द्वारा, ग़ालिब के एक शेर की तर्ज़ पर पढ़ा हुआ ये शेर याद आ रहा है,

हज़ारों कुर्सियां एैसी, कि हर कुर्सी पे दम निकले।\
जो इस पर बैठ कर खुद से उठे हों, एैसे कम निकले।।

– विकास ठाकुर

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