दिल्लीवालों के लिये एक मिसाल बनने का सुनहरा अवसर है

देश की रातनीति के स्वर, पिछले कुछ महीनों से बदले बदले बदले से सुनाई दे रहे हैं। हाल ही में आये, महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और जम्मू-काश्मीर विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद, विभिन्न राजनैतिक पार्टीयों के नेताओं के बयानों को सुनने से लगता है कि, इन नेताओं को पहली बार समझ में आया कि, चुनावों में हार या जीत में देश की आवाम का भी योगदान होता है। अन्यथा, पहले तो बस चुनावों की
घोषणा के एक महीने पहले से लेकर, वोटिंग के दिन तक ही, वोटरों के पोस्टर ‘राजनैतिक सिनेमाघरों‘ पर लगे दिखते थे। पर अब चुनाव में हारे हुए प्रत्याशी भी ‘जनादेश‘ को सर आंखों पर लेते नज़र आने लगे हैं। और जो खुशकिस्मत जीते हैं, वो भी क्षे़त्र की जनता और विशेषकर अपने ‘प्रीपेड या पोस्टपेड कार्यकर्ताओं‘ का कोटि कोटि अभिवादन और धन्यवाद करते नहीं थक रहे।

Aam Aadmi Party logo.svg राजनैतिक व्यवस्था के ‘आवामोन्मुखी अच्छे दिन‘

देश में मोदी लहर को ठंडा करते हुए महाराष्ट्र की जनता ने एक खंडित जनादेश दिया। पढ़े लिखे ‘मी मराठी‘ ने अपने मराठत्व पर आंच नहीं आने दी। देखना होगा कि अब जब महाराष्ट्र में सरकारी कद्दू कटेंगे तो किस किस में बटेंगे ? क्योंकि इस बार महाराष्ट्र में हिस्सा मांगने वालों में एक नया वर्ग पैदा हुआ है, जो ‘आम आदमी‘ का है।

हरियाणा के वोटरों ने सोचा कि मोदी जी के अपने पड़ोसी राज्य में बैठे होने का फायदा उठायेंगे। इसलिये भाजपा को पूर्ण बहुमत दे कर नवाज़ दिया। वैसेे भी, जिस राज्य में ‘सरकार‘ से बड़े ‘डेरे‘ होते जा रहे हों, वहां की जनता और करती भी क्या। और हरियाणा में भाजपा को मिले इस पूर्ण बहुमत का पहला शिकार, देश का वो ‘मीडिया‘ बना, जिसने भाजपा की इस उपलब्धी में अपनी पूर्ण ‘अकाउंटेड फाॅर‘
सहभागिता दिखायी थी।

झारखंड की जनता ने भी मोदी लहर पे सवार हो भाजपा को राज्य की सत्ता पर काबिज़ कर दिया। यहां की जनता ने जब देश के प्रधानमंत्री को अपनी चुनावी रैलियों में, झारखंड की पिछली सरकारों को ‘चोर लुटेरा‘ कहते सुना, तो उन्हें लगा कि राज्य के अच्छे दिन ये पार्टी ही लायेगीें।

और हाल ही में जम्मू कश्मीर के चुनावी नतीजों में भाजपा अपने ‘मिशन पूर्णबहुमत‘ और सरकार बनाने हेतु समर्थन जुटाने में असफल रही। पूर्व मुख्यमंत्री ने हार के बावजूद, वादी की राजनीति पर अपनी पकड़ और समझ का सटीक इस्तेमाल करते हुए, अंतत्वोगत्वा राज्य में राज्यपाल शासन लगवा ही दिया।

महाराष्ट्र में एनसीपी-कांग्रेस और भाजपा-शिवसेना जैसी राष्ट्रीय पार्टीयों का अलग अलग चुनाव लड़ना भी कहीं न कहीं वहां की जनता के प्रति सम्मान सूचक संदेश था। किसी भी राज्य में दो ‘राष्ट्रीय पार्टीयों‘ में प्रीपोल एलायंस, यानि चुनावों के पहले सीटों का बटवारा, उस क्षेत्र की जनता के प्रति विश्वासघात नहीं तो और क्या है ? वैसे जब तक भारतीय मतदाता, चुनावों को मुफत की दारू,
साड़ी, दरी, हज़ार बारह सौ रूपये आदि पा लेने का ‘चुनावी-उत्सव‘ समझना नहीं छोड़ेगा, तब तक दोष शायद उसका ही होगा। और मतदाताओं का वो वर्ग, जो सब तरह से सक्षम है, के चुनावों के प्रति सरोकारों में आयी गिरावट भी बहुत चिंतनीय विषय है। देश के वो राज्य जहां साक्षरता दर और प्रति व्यक्ति आय, अन्य राज्यों से बेहतर है, वहां के वोटर को अब ‘राजनैतिक विकल्पों‘ की महत्ता समझ में आने लगी है।
उसे पता है कि उसके पड़ोस में रहने वाले ‘सरकारी बाबू‘ के यहां से एसीबी रेड में बरामद पचास करोड़ रूपये कहां से आये हैं और कहां तक जाने थे।

देश में एक एैसा ‘वोटर समूह‘ तैयार होने लगा है, जिसको अपने वोट की कीमत ‘कैश‘ में नहीं ‘काईंड‘ में चाहिये। एैसा ‘वोटर समूह‘ जो अपने बच्चे का भविष्य, ‘सरकारी स्कूल‘ में पढ़ा कर भी संवार देने के सपने देखता है। जो अपनी बीमार मां को सरकारी अस्पताल के स्टाफ के भरोसे छोड,़ निष्फिक्र होकर, अपनी नौकरी पर जाने की हिम्मत जुटाना चाहता है। जिसे अपने नवजात बच्चे के ‘जन्म प्रमाण पत्र‘
या अपनी दिवंगत माॅ के ‘मृत्यु प्रमाण पत्र‘ के लिये, ‘कमीशन‘ या घूस देना नागवार गुज़रता है। वो, जिसे पड़ोसी राज्य के एक व्यापारी द्वारा, अपने स्टाफ को, दीवाली बोनस में कारंे बांटे जाने की खबर सुनने के बाद, निजिकरण की भेेंट चढ़े ‘अपने‘ सरकारी कारखाने और घर पर बेरोज़गार बैठे जवान बेटे को देख, रोना आ जाता है। एैसा ‘वोटर समूह‘, जो अपने क्षेत्र की सरकारी राशन की दुकान पर लगे
ताले की चाबी, ‘मोदी जी‘ के ‘चाबीयों के छल्ले‘ में ढूंढता है। एैसा ‘वोटर समूह‘, जो भ्रष्टाचार के कैंसर से मरणासन्न पड़ी ‘राजनैतिक व्यवस्था‘ के जीर्णाेद्धार के लिये, ‘प्रो-पीपल संजीवनी‘ पर शोध करना चाहता है। और जो, इन सभी मुद्दों पर राजनीति करने वाले ‘एकमात्र राजनैतिक दल‘ को वो वोट देकर, अपने ‘हक का विकास‘ होते देखना चाहता है।

वोटरों का ये समूह, समकालीन ‘समृद्ध और निरंकुश‘ राजनैतिक दलों द्वारा आये दिन उठाये जाने वाले खामखा के मुद्दों पे, खुद को शर्मसार होता पाता है। कहीं कोई नेता अपनी भैंसों की विक्टोरिया से तुलना करता है, कोई महिलाओं की वेशभूषा पर टिप्पणी करने में मशगूल है, कोेेेई झुग्गीयों में गुज़र बसर कर रहे परिवारों की ‘घर-वापसी‘ को लेकर अभियानरत है। कहीं से एक समाज विशेष की जनसंख्या
वृद्धि का आहवान हो रहा है। तो कहीं सत्याग्रहियों को धरनेबाज़, नक्सल करार करने की कोशिशें चालू हैं। और इन सब ज्वलंत और अतिमहत्वपूर्ण मुद्दों के बीच, ‘आम आदमी‘ अपने बिजली, पानी, नाली, अस्पताल, स्कूल, भ्रष्टाचार जैसे ‘चिल्हर और बजबजाते‘ मुद्दों की हंडिया, सरकारी चूल्हे पर चढ़ा, समाधान की आस में रोज़ भूखा ही सो जाता है।

पर इस सारे राजनैतिक घटनाक्रम के बीच देश में एक अलग ही राजनैतिक क्रांति उभरी है। जो चुनावी हार जीत से मीलों आगे, देश की आवाम को ये समझाने में लगी है कि, आपकी छोटी-बड़ी सभी समस्याओं के पीछे, कहीं न कहीं देश की ‘रातनैतिक व्यवस्था‘ ही जि़म्मेदार है। और इस क्रांति का नाम है ‘आम आदमी पार्टी‘।

आम आदमी पार्टी के दो साल के कार्यकलापों में उसने काफि सारे उतार चढ़ाव देखे। पर ये बात सौ फीसदी मानने वाली है कि ‘आप‘ समर्थकों को ये बात तो पक्की समझ में आ गयी कि अगर कहीं कुछ बदलना है तो ‘आम आदमी पार्टी‘ के सिवाये कोई भी राजनैतिक दल काम नहीं आने वाला। क्योंकि अपनी पार्टी को चुनाव लडा़ने के लिये इन समर्थकों ने अपने बच्चे की गुल्लक में जमा पैसे भी दान किये हैं। अपनी ‘आम आदमी
पार्टी’ में उनकी ‘आस्था और विश्वास‘ ही इस पार्टी को सबसे अलग ‘पार्टी और आंदोलन‘ बने रहने की शक्ति दे रहा है।

‘आम आदमी पार्टी‘ के अथक प्रयासों और दबाव ने केंद्र सरकार को दिल्ली में फिर से विधानसभा चुनाव करवाने पर मजबूर कर दिया। नहीं तो एक समय तो एैसा प्रतीत हो रहा था कि राष्ट्रपति शासन के बाद दिल्ली में ‘मौसेरे भाईयों‘ की सरकार बन जायेगी। पर दिल्ली वालों के सौभाग्य से एैसा हो न सका। खैर, अब जब दिल्ली में चुनावों की तारीख की घोषणा हो चुकी है, तो चालीस हजार करोड़ रूपये का प्रश्न ये
उठता है कि, दिल्ली की जनता अपने ही चालीस हजार करोड रूपये सालाना के बजट की चाबी किसी राजनैतिक दल को देकर पांच साल तक अच्छे दिनों की राह देखना चाहती है, या फिर इन पैसों को खुद के विकास में पारदर्शी रूप से लगते हुए देखना चाहती है।

दिल्लीवालों को ये समझना होगा कि इन चुनावों में उनपर सिर्फ अपने राज्य की सरकार चुनने का दायित्व नहीं है, बल्कि पूरे देश के लिये एक मिसाल बनने का सुनहरा अवसर भी है। अगर दिल्ली ने इन चुनावों में भी अपने पिछले जनादेश को दोहरा दिया, तो समझिये देश की राजनैतिक व्यवस्था (जिसका खामियाजा आज पूरा देश भुगत रहा है), के ‘अच्छे दिन‘ आने ही वाले हैं।

विकास ठाकुर