ये हिन्दुस्तान की रेले! ज!हा का बोझ ढोती है!
गरीबो! और अमीरो! की ये पुस्तैनी बपौती है
कोई कीमत चुकाता है कोई है मुफ्त का आदि
यहा! ए0सी0 मे! बापू की चमकती देख लो खादी

ये हिन्दुस्तान की रेले! ज!हा का बोझ ढोती है!
गरीबो! और अमीरो! की ये पुस्तैनी बपौती है
कोई कीमत चुकाता है कोई है मुफ्त का आदि
यहा! ए0सी0 मे! बापू की चमकती देख लो खादी

यहाॅ! हिन्दू और मुस्लिम भी सफर मे! साथ चलते है!
यहाॅ! पर सिक्ख,इसाई के,मिलकर मन मचलते है!
यहाॅ! पर धर्म और मजहब का दरिया साथ बहता है
यहाॅ! निर्पेक्ष कौमो! का हमेषा साथ रहता है!

यहा! फिरका परस्ती भी अदब से पेष आते है!
यहाॅ! तहजीब हिन्दुस्तान की ज!क्सन बताते है!
हरी और लाल झण्डी के करारो! के इषारे है!
यहाॅ! पर मौन अनुषाषन ,ये कैसे नजारे! है!

हरकत भी नही होती है जब पटरी बदलती है
यहा! मजहब मचलते है! तो पूरी कौम जलती है
हूकूमत भी तो रेलो! के रवेलो! से ही पलती है
य!हा फिरकापरस्ती भी सियासत से निकलती है

जीवन के सफर मे! भी मिलकर रेल बन जाओ
इसकी मौन भाशा का अमल जीवन मे! दिखलाओ
हर मजहब के डिब्बे को ,ई!जन एक ढोता है
सिमट कर आज भी डबरो मे!,हिन्दुस्तान रोता है

रेलो! के ही खेलो! से ये हिन्दुस्तान पलता है
सियासत की हूकूमत से क्यो! अरमान जलता है
सभी डिब्बो! मे! बैठे है! अमन और चैन लाने को
य!हा ज!जीर खि!चती है वतन अपना जलाने को

हर मजहब सिखाता है अमन और प्रेम को लाना
यहा! इ!जन का हर डिब्बा है पटरी का ही दीवाना
काफिर हो! , मुसाफिर हो! सफर अ!जाम देता है
ना झण्डा है ,ना सीटी है यहाॅ! फरमान नेता है

सफर का एक ही चिन्तन ,ये जीवन खेल हो जाये
हिन्दुस्तान का जज्बा जगत की रेल हो जाये
बने पटरी मजहब और धर्म , का ये मेल हो जाये
चालक आग जैसा हो , दरिन्दा फेल हो जाये।।
राजेन्द्रप्रसाद बहुगुणा(आग)

मित्र आप रेलवे विभाग से है!,इसिलिये मै! अवको इस असषा से एक रचना प्रेशित कर रहा हू!,ताकि आप इस रचना को अपने विभाग तक प!हुचाये, क्योकि अभी तक रेलवे के सम्बन्ध मे! किसी भी साहित्यकार द्वारा कुछ लिखा नही गया है,कृपया मुझे सूचित भी करे!

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