Read various poems and folklore on Rajputana’s hero Maharana Pratap, the famous battle of Haldighati, Jhalla and the braveheart Chetak in Hindi & English!

Maharana Pratap, the first freedom fighter of India is known for his bravery and valor. Unfortunately, our history text book do not mention much about the great fighter except the fact that he was a King of Mewar who protested against the third Mughal Emperor Akbar the Great. Yes, the nemesis often got more glorification in India than the son of the soils. Perhaps, that is why Akbar is called great and Maharana Pratap’s story finishes within one page in the history books.

Maharana Pratap Battle of Haldighati A Collection Of Maharana Pratap Poems!

However, the folklore glorify the real hero, thereby giving us lot of poems on Maharana Pratap’s bravery and courage. Here we share five such poems written on Maharana Pratap,

धन्य हुआ रे राजस्थान,जो जन्म लिया यहां प्रताप ने।
धन्य हुआ रे सारा मेवाड़, जहां कदम रखे थे प्रताप ने॥

फीका पड़ा था तेज़ सुरज का, जब माथा उन्चा तु करता था।
फीकी हुई बिजली की चमक, जब-जब आंख खोली प्रताप ने॥

जब-जब तेरी तलवार उठी, तो दुश्मन टोली डोल गयी।
फीकी पड़ी दहाड़ शेर की, जब-जब तुने हुंकार भरी॥

था साथी तेरा घोड़ा चेतक, जिस पर तु सवारी करता था।
थी तुझमे कोई खास बात, कि अकबर तुझसे डरता था॥

हर मां कि ये ख्वाहिश है, कि एक प्रताप वो भी पैदा करे।
देख के उसकी शक्ती को, हर दुशमन उससे डरा करे॥

करता हुं नमन मै प्रताप को,जो वीरता का प्रतीक है।
तु लोह-पुरुष तु मातॄ-भक्त,तु अखण्डता का प्रतीक है॥

हे प्रताप मुझे तु शक्ती दे,दुश्मन को मै भी हराऊंगा।
मै हु तेरा एक अनुयायी,दुश्मन को मार भगाऊंगा॥

है धर्म हर हिन्दुस्तानी का,कि तेरे जैसा बनने का।
चलना है अब तो उसी मार्ग,जो मार्ग दिखाया प्रताप ने॥

“माई ऐडा पूत जण जैडा राणा प्रताप
अकबर सोतो उज के जाण सिराणे साँप”

“चार बांस चौबीस गज, अष्ट अंगुल प्रमाण
ता ऊपर सुलतान है, मत चूके चौहान”

“बलहट बँका देवड़ा, करतब बँका गौड़
हाडा बँका गाढ़ में, रण बँका राठौड़”

Maharana Pratap Poem – Jhalla Ka Ballidaan

This poem is written by Shyam Narayan Pandey on Haldighati when the Mughals mistook Jhalla as Rana and strangulated him to death.

Maharana Pratap Haldighati A Collection Of Maharana Pratap Poems!

haldighati jhala ka balidaan 1 A Collection Of Maharana Pratap Poems!

Maharana Pratap Poems in Hindi by the Current Generation

मुगल काल में पैदा हुआ वो बालक कहलाया राणा
होते जौहर चित्तौड़ दुर्ग फिर बरसा मेघ बन के राणा

हरमों में जाती थीं ललना बना कृष्ण द्रौपदी का राणा
रौंदी भूमि ज्यों कंस मुग़ल बना कंस को अरिसूदन राणा

छोड़ा था साथियों ने भी साथ चल पड़ा युद्ध इकला राणा
चेतक का पग हाथी मस्तक ज्यों नभ से कूद पड़ा राणा

मानसिंह भयभीत हुआ जब भाला फैंक दिया राणा
देखी शक्ति तप वीर व्रती हाथी भी कांप गया राणा

चहुँ ओर रहे रिपु घेर देख सोचा बलिदान करूँ राणा
शत्रु को मृगों का झुण्ड जान सिंहों सा टूट पड़ा राणा

देखा झाला यह दृश्य कहा अब सूर्यास्त होने को है
सब ओर अँधेरा बरस रहा लो डूबा आर्य भानु राणा

गरजा झाला के भी होते रिपु कैसे छुएगा तन राणा
ले लिया छत्र अपने सिर पर अविलम्ब निकल जाओ राणा

हुंकार भरी शत्रु को यह मैं हूँ राणा मैं हूँ राणा
नृप भेज सुरक्षित बाहर खुद बलि दे दी कह जय हो राणा
कह नमस्कार भारत भूमि रक्षित करना रक्षक राणा!

चेतक था दौड़ रहा सरपट जंगल में लिए हुए राणा
आ रहा शत्रुदल पीछे ही नहीं छुए शत्रु स्वामी राणा

आगे आकर एक नाले पर हो गया पार लेकर राणा
रह गए शत्रु हाथों मलते चेतक बलवान बली राणा

ले पार गया पर अब हारा चेतक गिर पड़ा लिए राणा
थे अश्रु भरे नयनों में जब देखा चेतक प्यारा राणा

अश्रु लिए आँखों में सिर रख दिया अश्व गोदी राणा
स्वामी रोते मेरे चेतक! चेतक कहता मेरे राणा!

हो गया विदा स्वामी से अब इकला छोड़ गया राणा
परताप कहे बिन चेतक अब राणा है नहीं रहा राणा

सुन चेतक मेरे साथी सुन जब तक ये नाम रहे राणा
मेरा परिचय अब तू होगा कि वो है चेतक का राणा!

अब वन में भटकता राजा है पत्थर पे सोता है राणा
दो टिक्कड़ सूखे खिला रहा बच्चों को पत्नी को राणा

थे अकलमंद आते कहते अकबर से संधि करो राणा
है यही तरीका नहीं तो फिर वन वन भटको भूखे राणा

हर बार यही उत्तर होता झाला का ऋण ऊपर राणा
प्राणों से प्यारे चेतक का अपमान करे कैसे राणा

एक दिन बच्चे की रोटी पर झपटा बिलाव देखा राणा
हृदय पर ज्यों बिजली टूटी अंदर से टूट गया राणा

ले कागज़ लिख बैठा, अकबर! संधि स्वीकार करे राणा
भेजा है दूत अकबर के द्वार ज्यों पिंजरे में नाहर राणा

 

देखा अकबर वह संधि पत्र वह बोला आज झुका राणा
रह रह के दंग उन्मत्त हुआ कह आज झुका है नभ राणा

विश्व विजय तो आज हुई बोलो कब आएगा राणा
कब मेरे चरणों को झुकने कब झुक कर आएगा राणा

पर इतने में ही बोल उठा पृथ्वी यह लेख नहीं राणा
अकबर बोला लिख कर पूछो लगता है यह लिखा राणा

पृथ्वी ने लिखा राणा को क्या बात है क्यों पिघला राणा?
पश्चिम से सूरज क्यों निकला सरका कैसे पर्वत राणा?

चातक ने कैसे पिया नदी का पानी बता बता राणा?
मेवाड़ भूमि का पूत आज क्यों रण से डरा डरा राणा?

भारत भूमि का सिंह बंधेगा अकबर के पिंजरे राणा?
दुर्योधन बाँधे कृष्ण तो क्या होगी कृष्णा रक्षित राणा?

अब कौन बचायेगा सतीत्व अबला का बता बता राणा?
अब कौन बचाए पद्मिनियाँ जौहर से तेरे बिन राणा?

यह पत्र मिला राणा को जब धिक्कार मुझे धिक्कार मुझे
कहकर ऐसा वह बैठ गया अब पश्चाताप हुआ राणा

चेतक झाला को याद किया फिर फूट फूट रोया राणा
बोला इस पापकर्म पर तुम अब क्षमा करो अपना राणा

और लिख भेजा पृथ्वी को कि नहीं पिघल सके ऐसा राणा
सूरज निकलेगा पूरब से, नहीं सरक सके पर्वत राणा

चातक है प्रतीक्षारत कि कब होगी वर्षा पहली राणा
भारत भूमि का पुत्र हूँ फिर रण से डरने का प्रश्न कहाँ?

भारत भूमि का सिंह नहीं अकबर के पिंजरे में राणा
दुर्योधन बाँध सके कृष्ण ऐसा कोई कृष्ण नहीं राणा

जब तक जीवन है इस तन में तब तक कृष्णा रक्षित राणा
अब और नहीं होने देगा जौहर पद्मिनियों का राणा! – Agniveer

Maharana Pratap Poem On His Struggle in the Jungle – A Famous Poem That Illustrates His Bravery

अरे घास री रोटी ही , जद बन बिलावडो ले भाग्यो

नान्हो सो अमरियो चीख पड्यो,राणा रो सोयो दुख जाग्यो

अरे घास री रोटी ही…………

हुँ लड्यो घणो , हुँ सहयो घणो, मेवाडी मान बचावण न

हुँ पाछ नहि राखी रण म , बैरयां रो खून बहावण म

जद याद करुं हल्दीघाटी , नैणां म रक्त उतर आवै

सुख: दुख रो साथी चेतकडो , सुती सी हूंक जगा जावै

अरे घास री रोटी ही…………

पण आज बिलखतो देखुं हूं , जद राज कंवर न रोटी न

हुँ क्षात्र धरम न भूलूँ हूँ , भूलूँ हिन्दवाणी चोटी न

महलां म छप्पन भोग झका , मनवार बीना करता कोनी

सोना री थालयां ,नीलम रा बजोट बीना धरता कोनी

अरे घास री रोटी ही…………

ऐ हा झका धरता पगल्या , फूलां री कव्ठी सेजां पर

बै आज रूठ भुख़ा तिसयां , हिन्दवाण सुरज रा टाबर

आ सोच हुई दो टूट तडक , राणा री भीम बजर छाती

आँख़्यां म आंसु भर बोल्या , म लीख़स्युं अकबर न पाती

पण लिख़ूं कियां जद देखूँ हूं , आ रावल कुतो हियो लियां

चितौड ख़ड्यो ह मगरानँ म ,विकराल भूत सी लियां छियां

अरे घास री रोटी ही…………

म झुकूं कियां है आण मन , कुठ्ठ रा केसरिया बाना री

म भुजूं कियां हूँ शेष लपट , आजादी र परवना री

पण फेर अमर री सुण बुसकयां , राणा रो हिवडो भर आयो

म मानुं हूँ तिलीसी तन , सम्राट संदेशो कैवायो

राणा रो कागद बाँच हुयो , अकबर रो सपनो सौ सांचो

पण नैण करो बिश्वास नही ,जद बांच-बांच न फिर बांच्यो

अरे घास री रोटी ही…………

कै आज हिमालो पिघल भयो , कै आज हुयो सुरज शीतल

कै आज शेष रो सिर डोल्यो ,आ सौच सम्राट हुयो विकल्ल

बस दूत ईशारो जा भाज्या , पिथठ न तुरन्त बुलावण न

किरणा रो पिथठ आ पहुंच्यो ,ओ सांचो भरम मिटावण न

अरे घास री रोटी ही…………

बीं वीर बांकूड पिथठ न , रजपुती गौरव भारी हो

बो क्षात्र धरम को नेमी हो , राणा रो प्रेम पुजारी हो

बैरयां र मन रो कांटो हो , बिकाणो पुत्र खरारो हो

राठोङ रणा म रह्तो हो , बस सागी तेज दुधारो हो

अरे घास री रोटी ही…………

आ बात बादशाह जाण हो , घावां पर लूण लगावण न

पिथठ न तुरन्त बुलायो हो , राणा री हार बंचावण न

म्है बान्ध लियो है ,पिथठ सुण, पिंजर म जंगली शेर पकड

ओ देख हाथ रो कागद है, तु देख्यां फिरसी कियां अकड

अरे घास री रोटी ही…………

मर डूब चुंठ भर पाणी म , बस झुठा गाल बजावो हो

प्रण टूट गयो बीं राणा रो , तूं भाट बण्यो बिड्दाव हो

म आज बादशाह धरती रो , मेवाडी पाग पगां म है

अब बता मन,किण रजवट र, रजपूती खून रगां म है

अरे घास री रोटी ही…………

जद पिथठ कागद ले देखी , राणा री सागी सेनाणी

नीचै से सुं धरती खसक गयी, आँख़्या म भर आयो पाणी

पण फेर कही तत्काल संभल, आ बात सपा ही झुठी है

राणा री पाग सदा उंची , राणा री आण अटूटी है

अरे घास री रोटी ही…………

ल्यो हुकम हुव तो लिख पुछं , राणा र कागद र खातर

ले पूछ भल्या ही पिथठ तू ,आ बात सही, बोल्यो अकबर

म्है आज सुणी ह , नाहरियो श्यालां र सागे सोवे लो

म्है आज सुणी ह , सुरज डो बादल री ओट्यां ख़ोवे लो ||

म्है आज सुणी ह , चातकडो धरती रो पाणी पीवे लो

म्है आज सुणी ह , हाथीडो कुकर री जुण्यां जीवे लो || म्है आज सुणी ह , थक्या खसम, अब रांड हुवे ली रजपूती

म्है आज सुणी ह , म्यानां म तलवार रहवैली अब सुती ||

तो म्हारो हिवडो कांपे है , मुछ्यां री मौड मरोड गयी

पिथठ न राणा लिख़ भेजो , आ बात कठ तक गिणां सही.

अरे घास री रोटी ही…………

पिथठ र आख़र पढ्तां ही , राणा री आँख़्यां लाल हुई

धिक्कार मन मै कायर हुं , नाहर री एक दकाल हुई ||

हुँ भूख़ मरुँ ,हुँ प्यास मरुँ, मेवाड धरा आजाद रेह्वै

हुँ भोर उजाला म भट्कुं ,पण मन म माँ री याद रेह्वै

हुँ रजपुतण रो जायो हुं , रजपुती करज चुकावुं ला.

ओ शीष पडै , पण पाग़ नही ,पीढी रो मान हुंकावूं ला ||

अरे घास री रोटी ही…………

पिथठ क ख़िमता बादल री,जो रोकै सुर्य उगाली न

सिंहा री हातल सह लेवै, बा कूंख मिली कद स्याली न ||

धरती रो पाणी पीवे इह्शी चातक री चूंच बणी कोनी

कुकर री जूण जीवे, इह्सी हाथी री बात सुणी कोनी ||

आ हाथां म तलवार थकां कुण रांड कवै है रजपूती

म्यानां र बदलै बैरयां री छातां म रह्वली सुती ||

मेवाड धधकतो अंगारो, आँध्याँ म चम – चम चमकलो

कडक र उठ्ती ताना पर, पग पग पर ख़ांडो ख़ड्कै लो ||

राख़ो थे मुछ्यां ऐंठेडी, लोही री नदीयां बहा दयुंलो

हुँ अथक लडुं लो अकबर सूं, उज्ड्यो मेवाड बसा दयुंलो ||

“जद राणा रो शंदेष गयो पिथठ री छाती दूणी ही

हिन्दवाणो सुरज चमको हो, अकबर री दुनिया सुनी ही “

अरे घास री रोटी ही , जद बन बिलावडो ले भाग्यो

नान्हो सो अमरियो चीख पड्यो,राणा रो सोयो दुख जाग्यो.

Poem On Maharana Pratap, Chetak and Rajputana

Maharana Pratap at Udaipur A Collection Of Maharana Pratap Poems!

बकरों से बाघ लड़े¸
भिड़ गये सिंह मृग–छौनों से।
घोड़े गिर पड़े गिरे हाथी¸
पैदल बिछ गये बिछौनों से।।1।।

हाथी से हाथी जूझ पड़े¸
भिड़ गये सवार सवारों से।
घोड़ों पर घोड़े टूट पड़े¸
तलवार लड़ी तलवारों से।।2।।

हय–रूण्ड गिरे¸ गज–मुण्ड गिरे¸
कट–कट अवनी पर शुण्ड गिरे।
लड़ते–लड़ते अरि झुण्ड गिरे¸
भू पर हय विकल बितुण्ड गिरे।।3।।

क्षण महाप्रलय की बिजली सी¸
तलवार हाथ की तड़प–तड़प।
हय–गज–रथ–पैदल भगा भगा¸
लेती थी बैरी वीर हड़प।।4।।

क्षण पेट फट गया घोड़े का¸
हो गया पतन कर कोड़े का।
भू पर सातंक सवार गिरा¸
क्षण पता न था हय–जोड़े का।।5।।

चिंग्घाड़ भगा भय से हाथी¸
लेकर अंकुश पिलवान गिरा।
झटका लग गया¸ फटी झालर¸
हौदा गिर गया¸ निशान गिरा।।6।।

कोई नत–मुख बेजान गिरा¸
करवट कोई उत्तान गिरा।
रण–बीच अमित भीषणता से¸
लड़ते–लड़ते बलवान गिरा।।7।।

होती थी भीषण मार–काट¸
अतिशय रण से छाया था भय।
था हार–जीत का पता नहीं¸
क्षण इधर विजय क्षण उधर विजय।।8


कोई व्याकुल भर आह रहा¸
कोई था विकल कराह रहा।
लोहू से लथपथ लोथों पर¸
कोई चिल्ला अल्लाह रहा।।9।।

धड़ कहीं पड़ा¸ सिर कहीं पड़ा¸
कुछ भी उनकी पहचान नहीं।
शोणित का ऐसा वेग बढ़ा¸
मुरदे बह गये निशान नहीं।।10।।

मेवाड़–केसरी देख रहा¸
केवल रण का न तमाशा था।
वह दौड़–दौड़ करता था रण¸
वह मान–रक्त का प्यासा था।।11।।

चढ़कर चेतक पर घूम–घूम
करता मेना–रखवाली था।
ले महा मृत्यु को साथ–साथ¸
मानो प्रत्यक्ष कपाली था।।12।।

रण–बीच चौकड़ी भर–भरकर
चेतक बन गया निराला था।
राणा प्रताप के घोड़े से¸
पड़ गया हवा को पाला था।।13।।

गिरता न कभी चेतक–तन पर¸
राणा प्रताप का कोड़ा था।
वह दोड़ रहा अरि–मस्तक पर¸
या आसमान पर घोड़ा था।।14।।

जो तनिक हवा से बाग हिली¸
लेकर सवार उड़ जाता था।
राणा की पुतली फिरी नहीं¸
तब तक चेतक मुड़ जाता था।।15।।

कौशल दिखलाया चालों में¸
उड़ गया भयानक भालों में।
निभीर्क गया वह ढालों में¸
सरपट दौड़ा करवालों में।।16।।

है यहीं रहा¸ अब यहां नहीं¸
वह वहीं रहा है वहां नहीं।
थी जगह न कोई जहां नहीं¸
किस अरि–मस्तक पर कहां नहीं।।17।

बढ़ते नद–सा वह लहर गया¸
वह गया गया फिर ठहर गया।
विकराल ब्रज–मय बादल–सा
अरि की सेना पर घहर गया।।18।।

भाला गिर गया¸ गिरा निषंग¸
हय–टापों से खन गया अंग।
वैरी–समाज रह गया दंग
घोड़े का ऐसा देख रंग।।19।।

चढ़ चेतक पर तलवार उठा
रखता था भूतल–पानी को।
राणा प्रताप सिर काट–काट
करता था सफल जवानी को।।20।।

कलकल बहती थी रण–गंगा
अरि–दल को डूब नहाने को।
तलवार वीर की नाव बनी
चटपट उस पार लगाने को।।21।।

वैरी–दल को ललकार गिरी¸
वह नागिन–सी फुफकार गिरी।
था शोर मौत से बचो¸बचो¸
तलवार गिरी¸ तलवार गिरी।।22।।

पैदल से हय–दल गज–दल में
छिप–छप करती वह विकल गई!
क्षण कहां गई कुछ¸ पता न फिर¸
देखो चमचम वह निकल गई।।23।।

क्षण इधर गई¸ क्षण उधर गई¸
क्षण चढ़ी बाढ़–सी उतर गई।
था प्रलय¸ चमकती जिधर गई¸
क्षण शोर हो गया किधर गई।।24।।

क्या अजब विषैली नागिन थी¸
जिसके डसने में लहर नहीं।
उतरी तन से मिट गये वीर¸
फैला शरीर में जहर नहीं।।25।।

थी छुरी कहीं¸ तलवार कहीं¸
वह बरछी–असि खरधार कहीं।
वह आग कहीं अंगार कहीं¸
बिजली थी कहीं कटार कहीं।।26।।

लहराती थी सिर काट–काट¸
बल खाती थी भू पाट–पाट।
बिखराती अवयव बाट–बाट
तनती थी लोहू चाट–चाट।।27।।

सेना–नायक राणा के भी
रण देख–देखकर चाह भरे।
मेवाड़–सिपाही लड़ते थे
दूने–तिगुने उत्साह भरे।।28।।

क्षण मार दिया कर कोड़े से
रण किया उतर कर घोड़े से।
राणा रण–कौशल दिखा दिया
चढ़ गया उतर कर घोड़े से।।29।।

क्षण भीषण हलचल मचा–मचा
राणा–कर की तलवार बढ़ी।
था शोर रक्त पीने को यह
रण–चण्डी जीभ पसार बढ़ी।।30।। 
वह हाथी–दल पर टूट पड़ा¸
मानो उस पर पवि छूट पड़ा।
कट गई वेग से भू¸ ऐसा
शोणित का नाला फूट पड़ा।।31।।

जो साहस कर बढ़ता उसको
केवल कटाक्ष से टोक दिया।
जो वीर बना नभ–बीच फेंक¸
बरछे पर उसको रोक दिया।।32।।

क्षण उछल गया अरि घोड़े पर¸
क्षण लड़ा सो गया घोड़े पर।
वैरी–दल से लड़ते–लड़ते
क्षण खड़ा हो गया घोड़े पर।।33।।

क्षण भर में गिरते रूण्डों से
मदमस्त गजों के झुण्डों से¸
घोड़ों से विकल वितुण्डों से¸
पट गई भूमि नर–मुण्डों से।।34।।

ऐसा रण राणा करता था
पर उसको था संतोष नहीं
क्षण–क्षण आगे बढ़ता था वह
पर कम होता था रोष नहीं।।35।।

कहता था लड़ता मान कहां
मैं कर लूं रक्त–स्नान कहां।
जिस पर तय विजय हमारी है
वह मुगलों का अभिमान कहां।।36।।

भाला कहता था मान कहां¸
घोड़ा कहता था मान कहां?
राणा की लोहित आंखों से
रव निकल रहा था मान कहां।।37।।

लड़ता अकबर सुल्तान कहां¸
वह कुल–कलंक है मान कहां?
राणा कहता था बार–बार
मैं करूं शत्रु–बलिदान कहां?।।38।।

तब तक प्रताप ने देख लिया
लड़ रहा मान था हाथी पर।
अकबर का चंचल साभिमान
उड़ता निशान था हाथी पर।।39।।

वह विजय–मन्त्र था पढ़ा रहा¸
अपने दल को था बढ़ा रहा।
वह भीषण समर–भवानी को
पग–पग पर बलि था चढ़ा रहा।।40।

फिर रक्त देह का उबल उठा
जल उठा क्रोध की ज्वाला से।
घोड़ा से कहा बढ़ो आगे¸
बढ़ चलो कहा निज भाला से।।41।।

हय–नस नस में बिजली दौड़ी¸
राणा का घोड़ा लहर उठा।
शत–शत बिजली की आग लिये
वह प्रलय–मेघ–सा घहर उठा।।42।।

क्षय अमिट रोग¸ वह राजरोग¸
ज्वर सiन्नपात लकवा था वह।
था शोर बचो घोड़ा–रण से
कहता हय कौन¸ हवा था वह।।43।।

तनकर भाला भी बोल उठा
राणा मुझको विश्राम न दे।
बैरी का मुझसे हृदय गोभ
तू मुझे तनिक आराम न दे।।44।।

खाकर अरि–मस्तक जीने दे¸
बैरी–उर–माला सीने दे।
मुझको शोणित की प्यास लगी
बढ़ने दे¸ शोणित पीने दे।।45।।

मुरदों का ढेर लगा दूं मैं¸
अरि–सिंहासन थहरा दूं मैं।
राणा मुझको आज्ञा दे दे
शोणित सागर लहरा दूं मैं।।46।।

रंचक राणा ने देर न की¸
घोड़ा बढ़ आया हाथी पर।
वैरी–दल का सिर काट–काट
राणा चढ़ आया हाथी पर।।47।।

गिरि की चोटी पर चढ़कर
किरणों निहारती लाशें¸
जिनमें कुछ तो मुरदे थे¸
कुछ की चलती थी सांसें।।48।।

वे देख–देख कर उनको
मुरझाती जाती पल–पल।
होता था स्वर्णिम नभ पर
पक्षी–क्रन्दन का कल–कल।।49।।

मुख छिपा लिया सूरज ने
जब रोक न सका रूलाई।
सावन की अन्धी रजनी
वारिद–मिस रोती आई।।50।। 

Here is a Folklore on Chetak – Paean of The Three Legged Dark Blue Horse (Folklore-Chetak) 

history maharana pratap facts A Collection Of Maharana Pratap Poems!

About brave battles and true grit 
When all that history is writ 
There will sit saddled, one great name 
Within the heroes’ hall of fame 
The horse Chetak’s, a Marwari 
A breed that would the least tarry.  

Three things are known of Marwari 
A battle horse of victory. 
That, its speed forges a path free, 
In danger helps the rider flee. 
That, man wounded, is not alone, 
And dead, astride he would reach home. 
 
One such, with such a human heart 
Would not from his rider be part 
Was, Chetak bred of faculty 
To serve with love and loyalty 
The horse friend of Rana Pratap 
When battle turned hazard of hap. 
 
So unlike, the rest of his breed 
He was the rarest of a steed 
Not black, not grey, not bald of pie 
Still strange dark blue of darkened sky 
The brave king, renowned was of course 
Called ‘Rider of the Dark Blue Horse’. 
 
Chetak’s amble and limbs were fine 
His hooves of dynamics divine 
When times the Rana rode a course 
Folks vied to catch a glimpse perforce 
Yet, they caught sight of, just blue tinge 
When Chetak raced, his sight would sing 

One Imperial Majesty  
Stoked battle at Haldigati 
Mughal Man Singh, war exponent 
Strode atop an elephant 
Fitted with wheels of sword-long-blades 
No charge could break his armoured glade. 
 
Thus, Haldigathi battlefield 
Where Rana’s men fought not to yield 
Saw them go down like pins unkempt 
So Rana made his last attempt 
A path through Mughal soldiers traced 
With Chetak towards Man Singh raced. 
 
Reared up the horse and brave man 
Above those blades, a daring plan 
Leapt and struck the elephant’s head 
Missed Singh, but mahout died instead 
The plan totally misfired 
Horse and king men-locked and mired. 
 
One foreleg of Chetak got cut 
Three legged he managed to butt 
Three legged he ran just as fast 
Two miles from that battlefield past 
His croup read Rana’s horsemanship 
Snaking, wobbling, frothing at lip. 
 
Chetak galloped, flew off a cliff 
Three legged flight, a challenge stiff 
Safe banks of the stream he touched 
Then shuddered hard and sideways lurched 
The stunned Rana giving God thanks 
Saw Chetak drop on the stream-banks. 
 
Towards Rana’s lap, inched his head 
Whinnied soft, snapped his breath, lay dead 
“My three legged friend! You are gone! 
Why !? You never left me alone!!” 
Wept the Rana and held him close 
Kissed his wet face and stroked his nose. 
 
The Rana escaped to return 
Goading grand battles from heartburn 
When dusts and scores did down settle 
In honour of Chetak’s mettle 
The Rana raised a monument 
Still marks that spot where Chetak went. 
 
Folklore etched their names in gold 
Paeans are sung, stories told 
Of rider and the brave blue horse 
Now, more renowned the horse of course 
In harness he died, one great name 

Years pass, but not that horse’s fame.

Folklore Source

Poem Source: 1, 2, 3, 4, 5

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