From religion to caste,Indian election is all about low politics.Election after election, all the parties have followed the same agenda: dirty politics.

2017 चुनाव: एक विश्लेषण

2017 चुनाव के परिमाण आ चुके हैं. आशा के अनुसार या विपरीत परिणाम है? निर्भर करता है कौन जीता कौन हारा. भाजपा विजयी हुयी है 2 राज्यों में, हारी २ राज्यों में (नए कानून बनाने वालों की खरीद हुयी अकानुनन तरीके से और सत्ता में आई भाजपा यहाँ भी), समाप्त हो गयी 1 राज्य में.

अति संक्षिप्त में कहें तो आंकड़ों का खेल है चुनाव. किसी भी दल का वर्चस्व नहीं है जनता पर, जो खंड खंड में बंटी है, जिसे ‘वोट बैंक’ या ‘सामाजिक आधार’ कहते हैं. पैसे और सत्ता का चेहरा है, पर इस आधार पर ठप्पा है धर्म, जाति, क्षेत्र का! जनता विभाजित है. यह ठप्पा भी काम करता है जनता को बांटने में! शाषक वर्ग, सारे अंतर्द्वंद के बावजूद, काबिज है सत्ता पर!

जनता का कहीं से अधिकार नहीं है राजनितिक दलों पर, उनपर भी नहीं जिसको इसना चुना है! यही स्वरूप है बुर्जुआ प्रजातंत्र का.

इस बिच मजदुर वर्ग और किसान के हालत और खस्ता हो रहे हैं! सुधार का मतलब एक ही होता है, मजदुर वर्ग का अधिक शोषण. श्रम कानूनों को ध्वस्त करना, किसानों के जमीन को लुटने के कानून को सरल बनाना! फ़्रांस के इन्ही ‘सुधार’ का विरोध करने के लिए 10 लाख से अधिक मजदुर सड़क पर थे! यह विरोध अमेरिका, ग्रीस, लैटिन अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका में भी दिखा. क्रांतिकारी विचारधारा और पार्टी ना होने से बिखर गए.

पिछला बिहार चुनाव यानी आंकड़ो के खेल का बहुत सही उदहारण था! ‘वोट बैंक’ का सही समीकरण किया गया और भाजपा ध्वस्त हो गयी. एकता, भले ही बुर्जुआ दलों के बीच हो, क्षेत्रिय दलों के बीच हो, पर एक राष्ट्रिय दल की मिटटी पलीद कर सकती है, ‘व्यक्तिवाद’ के लहर की हवा निकाल सकती हैं! राजद, जदयू और कोंग्रेस का महा गठबंधन जीत गया था!

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यूपी और उत्तराखंड भी अपवाद नहीं होता! हाँ, कुछ हद तक Anti Incumbency का असर भी हो सकता था. पर हुआ नहीं, विपक्ष 60% वोट लेकर भी ध्वस्त हो गया! जनता शोषण का विरोध चुनाव के जरिये भी करती है, पर धाक् के तिन पात; पहले हारे हुए दल सत्तासीन हो जाते हैं. कौंग्रेस की वापसी (पंजाब) यही दिखाता है. गोवा में भाजपा की हार और सिकुड़ती हुयी वोट बैंक इसी का उदहारण है!

वाम का क्या हुआ? बुर्जुआ चुनाव को ही लक्ष्य मान लेना, या उसी आधार पर सर्वहारा क्रांति का दिवा स्वप्न देखनेवालों का यही हाल होना था! इस हार की समीक्षा मार्क्सवादी लेनिनवादी तरीके से करना तो दूर, वह बुर्जुआ तरीके से भी शायद ही कर पायें! जाति समीकरण, लुभावने नारे और वादाएं, ‘जितने योग्य’ उम्मीदवार, धर्म, देशवाद, व्यक्तिवाद आदि ही तो आधार है आज के चुनाव में जित के लिए. हाँ, भारी पूंजी की भी जरुरत है! इनके लिए वर्ग संघर्ष, सर्वहारा अधिनायकत्व तो किताबों में है और आज के युग में पुराने पड गए हैं!

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इनका नेत्रित्व सुविधा भोगी हो चूका है. लोकसभा से मुखिया तक इनके जीते नेता ‘इमानदारी’ से सरकारी सुविधा लेते रहे हैं. इनके मध्यम आधार के कार्यकर्त्ता चंदा उगाही करने में महारथ हासिल की थी, खासकर वहां, जहाँ इनकी सरकार थी! सड़क पर आना और वर्ग संघर्ष की बात करना कठिन हो गया. यह सुविधा परस्ती संशोधन वाद लाया, क्रांति की जगह सुधार लाया, समाजवाद के जगह ‘प्रजातान्त्रिक समाजवाद’ आ गया. यानि पूंजी या निजी पूंजी को हटाने की बात ख़त्म कर दी गयी, श्रम दासता स्वाभाविक लगने लगा. समाजवाद में भी विपक्षी दलों की बात की गयी ताकि मजदुर वर्ग की “तानाशाही” ना आ सके, ‘प्रजातंत्र’ बहाल रहे!!!!! आम आदमी पार्टी ने तक़रीबन इनकी जगह ले ली. वह ‘मजदुर वर्ग’ की जगह ‘आम आदमी’ की बात करते हैं!

2017 चुनाव पर वापस आते हैं. मुख्य मुद्दा ‘विकास’ था, जो फर्जी जीडीपी पर सवार था. वैसे उसे भी हटाना पड़ा, क्यूंकि भाजपा और अन्य दलों को भी लग गया की यह मुद्दा अब काम नहीं कर रहा है! धार्मिक उन्माद, देशावाद, जाति, व्यक्तिवाद आदि का इस्तेमाल हुआ! पैसे, शराब, और नार्तिकियों के भौंडे गाने और नृत्य भी भारी संख्या में किये गए ताकि भीड़ जुटाई जा सके, वोट पाया जा सके. अरबों रुपये खर्च हुए.

इवीएम् में भी हेरा फेरी की शंकाए हैं पर फासीवाद का खतरा हो या नैतिक मूल्य खोने का कारन हो, विपक्ष ने इस मुद्दे पर कोई ख़ास आवाज़ नहीं उठाई!

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मिडिया ने भी ‘बखूबी’ अपना रोल निभाया. इसपर इतना कहना पर्याप्त होगा कि मिडिया एक व्यवसाय है, जिसका दुहरा चरित्र है. मुनाफे के आलावा यह प्रचार (खास वर्ग के लिए) में भी मुख्य हिस्सेदारी रखता है. इसमे पैसे लगाने वाले भला मजदुर वर्ग के हित की क्यूँ चर्चा करेंगे? कुछ ‘वामपंथी’ और ‘प्रगतिशील’ लोग खुश हो जाते हैं रविश कुमार और उनके जैसे पत्रकारों से.

एक क्रांतिकारी पार्टी क्या करे?

फासीवाद अब एक लक्षण नहीं रह गया है. यह हमारे बीच में है! जर्मनी का फासीवाद या नाजियों का नंगा नाच भले ही न दिखे, पर अब अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों, महिलायों को देखें. क्या खाए, क्या पहने भी अब समाज के कुछ ‘चुने’ दलाल तय कर रहे हैं! राज्य इन दलालों के साथ है. नास्तिक विचारधारा, गो मांस, रोजगार मांगना, युद्ध का विरोध करना अब अपराध बन गया है. पुलिस, प्रशाशन का चरित्र तो मालूम ही था, न्यायपालिका भी इनके रंग में रंग चूका है! 90% विकलांग साईं बाबा और साथियों, मरुतो उद्योग लिमिटेड के मजदूरों को बिना सबुत के उम्र कैद की सजा दी गयी. वहीँ अम्बानी के विरुद्ध ऍफ़आइआर को कानून में संशोधन कर खारिज कर दिया गया!

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2017 का चुनाव ख़ामोशी से नहीं, चीख चीख के पुकार रहा है क्रन्तिकारियों को, मजदुर वर्ग के अगुआ दस्ते को, शोषित वर्गों को, युवकों को; जागो, देखो, समझो इस फासीवाद के खुनी हाथ को, इसके भयानक लक्ष्य को. इसकी सारी साजिश को, जो पुन्जिपतियों के मुनाफे को बढ़ाना है, मजदुर वर्ग और किसान को लुटना है.

हमारी एकता और संघर्ष एक क्रांतिकरी समझ के साथ ही फासीवाद को हरा सकता है! साथ साथ यह भी स्पष्ट हो की आज का मुख्य संघर्ष श्रम और पूंजी का है! यानी हमारी लडाई फंसिवाद को ही हराना नहीं, बल्कि इसकी जननी पूंजीवाद को भी हराना है. समाजवाद की स्थापना करना है! हर शोषण को ख़त्म करना है!

By K.K Singh at indiaopines blog

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