Ongoing differences between the left and the right in politics date back to the years ago from now. And the tiff is yet on.

जो लोग ये सोच कर परेशान हो रहे हो की भाई ये Bharatiya Janata Party (BJP) एक तरफ़ तो अफ़ज़ल गुरु को शहीद मानने वाली PDP से गठबंधन करके जम्मू कश्मीर में सरकार बनाती है, फिर JNU में अफ़ज़ल गुरू पे हुए कार्यक्रम पे भरकने का ऐसा नाटक क्यूँ।

BJP pdp राष्ट्रवाद या संघवाद (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघवाद)
और क्यूँ कन्हैया कुमार को देश द्रोह के आरोप में अंदर किया, ना तो उसने ये कार्यक्रम आयोजित किया था ना ही उसने कोई देश विरोधी नारे लगाए। छात्र संघ का अध्यक्ष होने के नाते वो बस वहाँ उपस्थित था।

इसका असली कारण है दक्षिण पंथियों (राइट विंग) और वाम पंथियों (लेफ़्टिस्ट) का आपसी टकराव और दक्षिण पंथियों के मन की कुंठा का परिणाम।वाम पंथ में मेरी बहुत आस्था नहीं है क्यूँकि वाम पंथ ने विश्व को बहुत कुछ ग़लत दिया है। लेकिन ये भी सच है की हर व्यक्ति ने अपने जीवन में कभी ना कभी वाम पंथी सोच स्वीकार किया है। समाज के सबसे वंचित तबके को उसका हक़ दिलाने के लिए।

हालाँकि मेरी नज़र में मार्क्स से बेहतर तरीक़ा अम्बेडकर का है, जहाँ तक वांछितों को उनका हक़ दिलाने की बात है।
अब समझना ये है की दक्षिण पंथियों के मन में वाम पंथियों के लिए ऐसी कुंठा क्यूँ है। इसे समझने के लिए, भारत के परिप्रेक्ष्य में वाम पंथ और दक्षिण पंथ के विस्तार को समझना होगा। भारत में वाम पंथ का विस्तार उन लोगों के द्वारा हुआ जो विदेशी शिक्षा और आध्यात्मिक, सामाजिक उत्थान से जुड़े। ये पढ़े लिखे बौद्धिक क़िस्म के लोग थे। इन्हें हर व्याख्यान में इज़्ज़त और स्वीकार्यता मिली। धीरे धीरे वाम पंथ में जुड़ने वाले बाक़ी लोग भी डॉक्टरेट और डि लिट वाले लोग थे। इन्होंने भारत के सभी प्रामाणिक विश्वविद्यालयों में अपना प्रभुत्व जमा लिया और किसी और विचार के लिए बहुत कम या नहीं के बराबर जगह बच पायी।

left vs right राष्ट्रवाद या संघवाद (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघवाद)
वोहि दूसरी और आज का दक्षिण पंथ बीते ज़माने के सामंत वादी व्यवस्था का नया रूप है। वैसे लोगों का समूह जिन्हें आदि काल की दोहन पे टिकी सामाजिक व्यवस्था से सबसे ज़्यादा फ़ायदा था। बाद में अंग्रेजो ने इनका उपयोग समाज को बाँटे रखने के लिए किया और इसीलिए दक्षिण पंथ अंग्रेजो का कमोबेस समर्थक रहा और किसी भी सामाजिक सुधार के कार्यक्रम जैसे छुआछूत, विधवा विवाह, ज़मींदारी उन्मूलन, इत्यादि से अलग रहा या उसका विरोध किया।

अंग्रेजो के बाद कांग्रिस ने इनका उपयोग वाम पंथ के प्रभाव को रोकने के लिए किया। जहाँ एक तरफ़ वाम पंथ विश्वविद्यालयों में अपने प्रभुत्व, अपने लोगों के बौधिक वाद विवाद के दम पर अपना विस्तार कर रहा था। वोहि दूसरी और दक्षिण पंथी कभी गणेश जी को दूध पिलाने के अफ़वाह पे, तो कभी किसी मंदिर के आगे माँस का टुकड़ा फ़िक्वा के, तो कभी मंदिर मस्जिद का मुद्दा उठा कर अपना विस्तार कर रही थी।

Babri Masjid राष्ट्रवाद या संघवाद (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघवाद)
और इस सब में उन्हें कांग्रिस का गुप्त समर्थन प्राप्त था। जब वाम पंथ और कांग्रिस का हो गया और दक्षिण पंथियों के अपने राजनीतिक पक्ष भाजपा को लोगों में स्वीकार्यता मिली तो उनका ध्यान अपने बौधिक दिवालियेपन की तरफ़ गया।
आख़िर वाम पंथियों ने अपने समर्थन में साहित्य की फ़ौज खरी की हुई थी, व्याख्यान के लिए डॉक्टरेट किए हुए लोगों की फ़ौज और फिर सबसे ज़्यादा PhD कर रहे वाम पंथ को समर्थित विद्यार्थी। जब की दूसरी तरफ़ दक्षिण पंथियों के पास साहित्य के नाम पे मनु स्मृति, सावरकर के लेख और गोलवलकर की विचारों का संकलन (bunch of thoughts) इत्यादि ही था। वो भी बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा बनाये और नेहरु द्वारा संजोये लोकतंत्र में खुल कर अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता था।

दक्षिण पंथ की बौधिक विवेचना अभी तक जागरण, अष्टयाम और माता की चौकी की आर में भरकाऊ और बाँटने वाली बयानबाज़ी तक सीमित था

वाम पंथ से बौधिक टकराव के लिए दक्षिण पंथ को या तो अपने विद्वान बढ़ाने थे, शोध करना था, साहित्य लिखने थे। पर इसका ख़तरा ये था की विद्वान होने पर अमूमन लोग दक्षिण पंथ की इस अवधारणा से सहमत ना हों। क्यूँकि दक्षिण पंथ की ये अवधारणा ग़रीब विरोधी और ठोकशाही के दम पर टिकी है।

विश्वविद्यालयों में जब बौधिक संघर्ष कर दक्षिण पंथी अपनी जगह नहीं बना पाए तो अब वो सत्ता का सहारा ले कर और विरोध को कुचल कर अपनी जगह बनाना चाहते है या कह लो की अपनी कुंठा मिटाना चाहते है। वो सत्ता जो उन्हें कांग्रिस की नाकामयाबी और जनता के ग़लत फ़ैसले की वजह से मिली है। ये राष्ट्रवाद की नहीं बल्कि दक्षिण पंथियों के संघवाद की लड़ाई है।

By Abhishek Kumar Preetam at indiaopines blog

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